प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर: इल्म, संवाद और सामाजिक सरोकारों की एक सशक्त आवाज़

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कुछ व्यक्तित्व पद से बड़े होते हैं और कुछ अपनी सोच से। प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर का सार्वजनिक जीवन शिक्षा, संवाद, भाषा और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी ऐसी ही एक प्रेरणादायक यात्रा का परिचय देता है। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के प्रमुख चेहरों में शुमार डॉ. शाहिद अख्तर ने विभिन्न मंचों से शिक्षा, युवाओं, उर्दू भाषा, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर अपनी बात रखी है।

भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनती। इस देश की असली शक्ति उसकी विविध भाषाओं, संस्कृतियों, परंपराओं और विचारों के उस संगम में दिखाई देती है, जिसने सदियों से भारतीय समाज को एक साझा जीवन-दृष्टि दी है। इस विविधता के बीच संवाद की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर का सार्वजनिक व्यक्तित्व इसी संवाद की आवश्यकता को रेखांकित करता हुआ दिखाई देता है।

उनकी कार्यशैली और सार्वजनिक संबोधनों में शिक्षा को परिवर्तन की बुनियाद के रूप में देखने की दृष्टि विशेष रूप से उभरती है। उनका मानना रहा है कि किसी भी समाज को आगे बढ़ाने के लिए केवल आर्थिक संसाधन पर्याप्त नहीं होते; ज्ञान, विवेक, आधुनिक शिक्षा और नई पीढ़ी में जिम्मेदारी की भावना भी उतनी ही आवश्यक है।

शिक्षा—जो व्यक्ति से समाज तक रोशनी पहुँचाती है

शिक्षा के क्षेत्र से लंबे समय तक जुड़े रहे प्रो. शाहिद अख्तर के लिए शिक्षा केवल कक्षाओं, पाठ्यक्रमों और डिग्रियों तक सीमित विषय नहीं है। उनके सार्वजनिक विचारों में शिक्षा को व्यक्ति के आत्मविश्वास, समाज की प्रगति और राष्ट्र के भविष्य से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।

विशेषकर युवाओं को लेकर उनका दृष्टिकोण उल्लेखनीय है। युवा किसी भी देश की सबसे बड़ी ऊर्जा होते हैं। यदि इस ऊर्जा को ज्ञान, कौशल और सकारात्मक सोच की दिशा मिले, तो वही पीढ़ी सामाजिक परिवर्तन की वाहक बन सकती है। डॉ. अख्तर के सार्वजनिक कार्यक्रमों और वक्तव्यों में युवाओं की भूमिका को लेकर यही व्यापक चिंता और उम्मीद दिखाई देती है।

उनके लिए आधुनिक शिक्षा का अर्थ अपनी जड़ों से दूरी बनाना नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सार्थक संतुलन स्थापित करना है।

उर्दू—सिर्फ भाषा नहीं, एक सांस्कृतिक विरासत

प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उर्दू भाषा और उससे जुड़े शैक्षिक-सांस्कृतिक सरोकारों से भी जुड़ा रहा है। उर्दू भारत की उन भाषाओं में है, जिसने देश की साझा संस्कृति, साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक जीवन को समृद्ध किया है। उर्दू के प्रति किसी भी गंभीर प्रयास को केवल भाषा संरक्षण के रूप में नहीं, बल्कि भारत की बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के रूप में भी देखा जा सकता है।

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डॉ. अख्तर की सार्वजनिक भूमिका में उर्दू और शिक्षा से जुड़े विषयों की उपस्थिति इस बात का संकेत देती है कि भाषा को वे केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति को जोड़ने वाली कड़ी के रूप में भी देखते हैं।

संवाद की संस्कृति—विरोध के बीच भी बातचीत की जगह

लोकतांत्रिक समाज की खूबसूरती केवल अलग-अलग विचार रखने में नहीं, बल्कि अलग विचार रखने वालों के साथ संवाद करने की क्षमता में भी होती है।

प्रो. शाहिद अख्तर के सार्वजनिक जीवन का एक महत्वपूर्ण आयाम सामाजिक संवाद से जुड़ा रहा है। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के विभिन्न कार्यक्रमों में उन्होंने राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और युवाओं की जिम्मेदारी जैसे विषयों पर अपनी बात रखी है। आज के दौर में, जब सार्वजनिक विमर्श कई बार तीखे मतभेदों और वैचारिक दूरियों से घिर जाता है, संवाद की भाषा का महत्व और बढ़ जाता है। ऐसे वातावरण में शिक्षा और बातचीत को माध्यम बनाकर सामाजिक विषयों पर चर्चा की कोशिश अपने आप में एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक भूमिका बन जाती है।

विचारों को शब्द देने की कोशिश: एक महत्वपूर्ण पुस्तक का संपादन

किसी व्यक्ति के विचार केवल भाषणों में ही नहीं, बल्कि पुस्तकों और लेखन के माध्यम से भी लंबे समय तक जीवित रहते हैं।

इसी कड़ी में प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर ने डॉ. केशव पटेल के साथ “भारतीय मुसलमान: एकता का आधार, हुब्बल वतनी (राष्ट्रीयता)” नामक महत्वपूर्ण पुस्तक का संपादन किया है। यह पुस्तक भारतीय मुस्लिम समाज, राष्ट्रीयता और एकता से जुड़े विचार-विमर्श को सामने रखने का एक गंभीर प्रयास है।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के आधिकारिक प्रकाशन मंच पर भी इस पुस्तक को विशेष स्थान दिया गया है, जो इसके महत्व को रेखांकित करता है। पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में विभिन्न विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया था, जिसने इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा को नई दिशा दी।

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पुस्तक और संवाद—दोनों माध्यमों में एक समान तत्व दिखाई देता है: विचारों को सामने रखना और समाज के भीतर विमर्श के लिए जगह बनाना। यह पुस्तक न केवल भारतीय मुस्लिमों की राष्ट्रीयता की भावना को दस्तावेज़ीकृत करती है, बल्कि यह भी स्थापित करती है कि कैसे ‘हुब्बल वतनी’ (राष्ट्रप्रेम) भारतीय मुस्लिम समाज की पहचान का अभिन्न अंग रहा है।

समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव

डॉ. शाहिद अख्तर की सार्वजनिक पहचान का एक पक्ष सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ा है। उनके संबोधनों में देश, समाज और आने वाली पीढ़ी के प्रति जिम्मेदारी का भाव दिखाई देता है। उनके विचारों को उनके समर्थक सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की दिशा में महत्वपूर्ण मानते हैं। वहीं, किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व की तरह उनके विचारों और संगठनात्मक भूमिका को अलग-अलग लोग अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते हैं। यही लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक विशेषता भी है—जहाँ व्यक्तियों के विचारों पर विमर्श और असहमति दोनों के लिए स्थान रहता है।

एक शिक्षक की दृष्टि, एक सामाजिक कार्यकर्ता की चिंता

प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर के व्यक्तित्व को केवल किसी एक पद या संगठन से जोड़कर देखना उनके व्यापक सार्वजनिक कार्यक्षेत्र को सीमित कर देना होगा। उनकी पहचान में एक ओर शिक्षक और शिक्षाविद् की दृष्टि दिखाई देती है, तो दूसरी ओर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद स्थापित करने की कोशिश भी नजर आती है। भाषा, शिक्षा, युवा और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर उनकी सक्रियता इसी व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है।

एक शिक्षक का सबसे बड़ा योगदान केवल ज्ञान देना नहीं होता; वह आने वाली पीढ़ी को सवाल पूछने, सोचने और समाज के प्रति अपनी भूमिका समझने की प्रेरणा भी देता है। डॉ. अख्तर की सार्वजनिक यात्रा को इसी दृष्टि से देखने पर उनका व्यक्तित्व शिक्षा से आगे बढ़कर सामाजिक संवाद के क्षेत्र तक विस्तृत दिखाई देता है।

आने वाली पीढ़ी के नाम एक संदेश

समय बदलता है, समाज बदलता है और चुनौतियाँ भी बदलती रहती हैं। लेकिन शिक्षा, संवाद और इंसानी रिश्तों की अहमियत कभी कम नहीं होती।

प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर का सार्वजनिक जीवन इन्हीं मूल्यों के इर्द-गिर्द दिखाई देता है। उनका जोर शिक्षा पर है, युवाओं की भूमिका पर है, भाषा और संस्कृति के संरक्षण पर है और सामाजिक संवाद पर भी। उनकी यात्रा से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही है कि समाज को बदलने के लिए केवल आवाज़ उठाना पर्याप्त नहीं; उस आवाज़ को ज्ञान, संवेदना और संवाद की शक्ति भी देनी होती है।

और शायद यही वह बिंदु है जहाँ एक शिक्षाविद् की भूमिका समाज के व्यापक सरोकारों से जुड़ती है—जहाँ किताबों से निकलकर विचार जीवन में आते हैं, भाषा संवाद का पुल बनती है और शिक्षा भविष्य की दिशा तय करने वाली रोशनी।

प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर का व्यक्तित्व इसी निरंतर प्रयास की एक तस्वीर प्रस्तुत करता है—इल्म से संवाद तक, भाषा से समाज तक और विचार से जिम्मेदारी तक।

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