नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति (VC) शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित के हालिया बयानों ने एक बड़े राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है। पूर्व सांसद और वरिष्ठ नेता कुंवर दानिश अली ने कुलपति के उस बयान पर तीखा प्रहार किया है, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की थी।
दानिश अली ने चेतावनी दी है कि शिक्षा के मंदिरों में किसी खास विचारधारा को थोपना सामाजिक न्याय की नींव को कमजोर करना है।
‘निजी पसंद’ नहीं, अब ‘संस्थागत खतरा’ है: दानिश अली
दानिश अली ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जब एक केंद्रीय विश्वविद्यालय की कुलपति खुलेआम कहती हैं कि वे RSS से प्रेरित हैं, तो यह केवल उनका व्यक्तिगत विश्वास नहीं रह जाता। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह की विचारधारा अब सीधे तौर पर संस्थान की नीतियों और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर रही है, जो कि लोकतंत्र और अकादमिक स्वतंत्रता के लिए शुभ संकेत नहीं है।
समानता की लड़ाई को ‘विक्टिमहुड’ कहना अपमानजनक
विवाद की मुख्य जड़ कुलपति द्वारा समानता और अधिकारों की लड़ाई को ‘विक्टिमहुड’ (Victimhood) करार देना है। इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए दानिश अली ने कहा:
“समानता के लिए किए जा रहे संघर्ष को ‘पीडि़त कार्ड’ (Victimhood) बताना दलित, ओबीसी (OBC) और अल्पसंख्यक छात्रों की गरिमा पर सीधा हमला है। हम विश्वविद्यालयों में सामाजिक न्याय को पीछे धकेले जाने की अनुमति नहीं दे सकते।”
शिक्षा के भगवाकरण पर उठे सवाल
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि दानिश अली का यह बयान देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ते वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर इशारा करता है। JNU जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में कुलपति का किसी खास संगठन के प्रति झुकाव, वहां के समावेशी माहौल और वंचित वर्ग के छात्रों के प्रतिनिधित्व पर सवालिया निशान खड़े करता है।
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