“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बां अब तक तेरी है…”
जब-जब दुनिया में जुल्म के खिलाफ आवाज उठती है, जब-जब इश्क और इंकलाब एक साथ मिलते हैं, तब-तब एक नाम गूँजता है— फ़ैज़ अहमद फ़ैज़। 13 फरवरी को उर्दू अदब के इस अज़ीम शायर की जयंती दुनिया भर में मनाई जाती है। फ़ैज़ सिर्फ एक शायर नहीं थे, वे एक विचारधारा थे, एक उम्मीद थे और दबे-कुचले लोगों की बुलंद आवाज़ थे।
सियालकोट से लेनिन शांति पुरस्कार तक का सफर
13 फरवरी 1911 को अविभाजित भारत के सियालकोट (अब पाकिस्तान) में जन्मे फ़ैज़ ने अपनी शायरी को केवल महबूब की जुल्फों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने शायरी को गलियों, बाज़ारों और जेल की सलाखों तक पहुँचाया। वे दक्षिण एशिया के पहले ऐसे शायर थे जिन्हें सोवियत संघ ने लेनिन शांति पुरस्कार से नवाज़ा था।
इश्क और इंकलाब का अनूठा संगम
फ़ैज़ की शायरी की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने ‘हसीं यादों’ और ‘कड़वे सच’ को एक ही तराजू में तौला। जहाँ उन्होंने लिखा:
“मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग”
वहीं उन्होंने यह भी अहसास कराया कि दुनिया में ‘और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा’। उनकी नज़्मों में रोमांस भी है और व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह भी।
‘हम देखेंगे’ – एक कालजयी नारा
आज के दौर में फ़ैज़ की नज़्म “हम देखेंगे” पूरी दुनिया में प्रतिरोध (Resistance) का सबसे बड़ा गान बन चुकी है। जब उन्होंने लिखा:
“लाज़िम है कि हम भी देखेंगे… जब अर्ज़-ए-खुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएंगे…”
तो वे केवल तत्कालीन तानाशाह जिया-उल-हक को चुनौती नहीं दे रहे थे, बल्कि वे दुनिया भर के हर उस शख्स को हिम्मत दे रहे थे जो अन्याय के खिलाफ खड़ा है।
जेल और निर्वासन: टूटी नहीं कलम
फ़ैज़ को अपनी बेबाकी की भारी कीमत चुकानी पड़ी। उन्हें ‘रावलपिंडी साजिश केस’ में सालों जेल में बिताने पड़े और कई साल देश निकाला (निर्वासन) भी झेलना पड़ा। लेकिन उनकी कलम कभी खामोश नहीं हुई। ‘ज़िंदां-नामा’ जैसी उनकी कालजयी कृतियाँ जेल की तन्हाइयों में ही लिखी गईं।
आज के दौर में फ़ैज़ की प्रासंगिकता
आज जब दुनिया वैचारिक मतभेदों और संघर्षों से जूझ रही है, फ़ैज़ के शब्द मरहम का काम करते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि:
- सच्चाई को कहने के लिए साहस की जरूरत होती है।
- अंधेरा चाहे कितना भी गहरा हो, ‘सहर’ (सुबह) का इंतज़ार लाज़िमी है।
- इंसानियत और मोहब्बत ही वह धागा है जो सरहदों को पार कर सकता है।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ आज हमारे बीच जिस्मानी तौर पर नहीं हैं, लेकिन उनकी नज़्मों की गूँज हर उस महफ़िल में है जहाँ हक की बात होती है। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना दरअसल उस हौसले को याद करना है जो कहता है— “कटते भी चरागों की तरह हाथ हमारे, चश्मे-ओ-कलम हाथ में थे, और हम ज़िंदा रहे।”
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी केवल शब्दों का जाल नहीं, बल्कि जज्बात और इंकलाब का एक समंदर है। उनकी जयंती के अवसर पर, यहाँ उनकी 5 सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली नज़्मों/गज़लों का संग्रह है, जो उनके फलसफे को बखूबी बयां करती हैं:
1. इंकलाबी तराना: ‘हम देखेंगे’
यह नज़्म आज दुनिया भर में विरोध और न्याय का प्रतीक बन चुकी है। इसे फ़ैज़ ने पाकिस्तान के तानाशाह जिया-उल-हक के दौर में लिखा था।
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे जब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे से, सब बुत उठवाए जाएँगे हम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएँगे सब ताज उछाले जाएँगे, सब तख़्त गिराए जाएँगे!
2. यथार्थ और प्रेम: ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग’
इस नज़्म में फ़ैज़ ने रोमांस को सामाजिक दुखों से जोड़ दिया। यह बताती है कि दुनिया की भूख और ज़ुल्म के सामने कभी-कभी प्यार भी छोटा पड़ जाता है।
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम-ओ-अटलस-ओ-कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लिथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए… “और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा…”
3. हौसले की आवाज़: ‘बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे’
यह नज़्म हर उस इंसान के लिए है जो अपनी आवाज़ उठाने से डरता है। यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबसे बड़ा पैगाम है।
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल ज़बां अब तक तेरी है तेरा सुतवां जिस्म है तेरा, बोल कि जां अब तक तेरी है देख कि आहंगर की दुकां में, तुंद हैं शोले सुर्ख है आहं खुलने लगे कुफ़्लों के दहाने, फैला हर एक ज़ंजीर का दाम!
4. जेल की तन्हाई: ‘ज़िंदां की एक शाम’
जब फ़ैज़ जेल में थे, तब उन्होंने अपनी तन्हाई और उम्मीद को इन शब्दों में पिरोया:
शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों से ज़िना-दर-ज़िना उतरती है रात यूं सुलगती है ठंडी ठंडी हवा जैसे चुपके से कह रही हो कोई बात… ज़िंदगी इस क़दर शीरीं (मीठी) है कि इस साअत में ज़हर का घूंट भी कड़वा नहीं लगता हरगिज़!
5. महफ़िल की शान: ‘गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले’
यह उनकी सबसे मशहूर ग़ज़लों में से एक है, जिसे मेहदी हसन साहब ने अपनी आवाज़ से अमर कर दिया।
गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले!
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