मशहूर अर्थशास्त्री और अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिका ‘रेडियंस’ के निदेशक डॉ0 वक़ार अनवर से ‘कान्ति’ साप्ताहिक के उपसंपादक मुहम्मद यूसुफ ‘मुन्ना’ की केन्द्रीय बजट के विषय पर बात-चीत
सवाल: केन्द्रीय बजट से किसको ज्यादा फायदा मिलेगा, कार्पोरेट या आम नागरिकों को ?
जवाब: वर्तमान राजनीति में जो नयी स्टैब्लिश्मेंट है, बजट पर उसकी सोच दिखती है। इस बजट को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पक्ष हैं। बजट में पूंजी निवेश पर काफी जोर दिया गया है। उत्पाद की बुनियादी जरूरतों को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है। बिजली, सड़क, रेल जैसे ट्रांसपोर्ट के बेहतर होने से माल की ढुलाई बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था आगे चल कर मजबूत होगी। इससे उत्पाद बढ़ेगा, निवेश होगा और तैयार माल की ढुलाई आसान होगी, जिसका फायदा अर्थव्यवस्था को होगा। बजट में नये तरह के विकास कार्यों पर ध्यान दिया गया है। देश में योग्यताओं की कमी नहीं है। जैसे आईटी सेक्टर में दुनिया ने भारत का लोहा माना है। विकास के क्षेत्र में जो नये माध्यम पैदा हो रहे हैं, उनके सदुपयोग को ध्यान में रखा गया है। इसमें संसाधनों के संतुलित बंटवारे का अभाव है।
सवाल: पिछली सरकारें भी निजीकरण की राह पर थीं, फिर इस सरकार के निजीकरण की नीतियों का विरोध क्यों ?
जवाब: मनमोहन सिंह सरकार में सरकारी संपत्तियों को बेचने अथवा उनके निजीकरण के पीछे तर्क दिया गया कि सरकार का काम शासन-व्यवस्था चलाना है, व्यापार करना नहीं है। सरकार ने उन संस्थानों का निजीकरण किया जो घाटे में थीं या जिनके संचालन में समस्या आ रही थी। इसके विपरीत वर्तमान सरकार उन संस्थानों का भी निजीकरण कर रही है, जो फायदे में हैं और जिनके संचालन में सरकार को कोई समस्या नहीं है। निजीकरण के जरिये उन उ़द्योगपतियों को फायदा पहुंचाया जा रहा हैं, जो सरकार के करीबी हैं। यानी निजीकरण का लाभ कुछ लोगों तक सीमित हो कर रह गया है। इनमें अडानी ग्रुप का नाम लिया जा सकता है। ये उद्योगपति सरकारी कंपनियों को खरीदने के लिए बैंकों से लोन लेते हैं, जो जनता का पैसा है। बाद में इनके पुराने कर्ज को माफ करके, नया कर्ज लेने का रास्ता साफ कर दिया जाता है। यानी जो उद्योगपति सरकारी कंपनियों को निजीकरण के नाम पर खरीद रहे हैं, उसमें उनका पैसों नहीं, जनता का पैसा लगा है।
सवाल: आपने कहा कि सरकार जो नीतियां अपना रही है, उससे आगे चल कर अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, दूसरी ओर कुछ चुनिन्दा उद्योगपतियों को निजीकरण का लाभ दिया जा रहा है और इसके लिए उनको भारी कर्ज दिया जा रहा है, फिर उसको माफ भी कर दिया जा रहा है, इसका अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा ?
जवाब: इस तरह की आर्थिक नीतियों से अल्प-कालिक नुकसान होगा। आज लोगों को भूख लगी है, तो उनको आज भोजन चाहिए, न कि आने वाले कल में। इसका विकल्प दीर्घ कालिक नीति नहीं हो सकती। अल्प-कालिक अवधि में लोगों तक लाभ पहुंचाने के लिए माइनारिटी और सोशल सेक्टर से फायदा हो रहा था, दीर्घ अवधि नीतियों को लाभ पहुंचाने के लिए बजट में उनकी राशि में कटौती कर दी गयी। जैसे मनरेगा, जिससे ग्रामीण-मजदूरों की जीविका में लाभ मिल रहा था, उसके फंड में कटौती कर दी गयी। इस तरह के फंड में धीरे-धीरे कटौती होती जा रही है। ऐसी स्कीम जिससे अल्पसंख्यकों, मजदूरों समेत सामाजिक स्तर पर लोंगों को फायदा मिल रहा था, उसमें कटौती हो रही है। इससे दीर्घ कालिक आय और लाभ दोनों बढें़गे, लेकिन उसका फायदा निचले स्तर तक नहीं के बराबर पहुंचेगा। ऐसी स्थिति में देश की जीडीपी तो बढ़ेगी लेकिन बेरोजगारी भी बढ़ेगी और दोनों साथ-साथ चलेंगे। इससे आर्थिक असमानता की खाई और चैड़ी होगी। देश की पूंजी कुछ पूंजीपतियों के हाथों तक सीमित हो कर रह जाएगी।
सवाल: आर्थिक असमानता इसी तरह बढ़ती रही तो इसके का दीर्घ कालिक नुकसान क्या हो सकते हैं ?
जवाब: अर्थव्यवस्था में टैक्स का महत्वपूर्ण योगदान है। टैक्स का बड़ा भाग आम नागरिक और नौकरीपेशा वर्ग से आता है। इसको इस तरह समझा जा सकता है कि कम आय वाला वर्ग ज्यादा टैक्स देता है और ज्यादा आय वाला वर्ग कम टैक्स देता है। उद्योग जगत पर टैक्स कम है। आम नागरिक अपने बचत को अपने सुरक्षित भविष्य के लिए निवेश करता है। टैक्स में छूट पाने के लिए एलआईसी और इस जैसी अनेक बचत योजनाओं में हिस्सा लेता है, जिनके लाभ को अब खत्म किया जा रहा है। पुरानी आर्थिक नीतियों की जगह नयी आर्थिक नीतियों को लागू किया जा रहा है। बजट में बचत का आधार खत्म किया जा रहा और पैसों की जरूरत पूरा करने के लिए कर्ज को बढ़ावा दिया जा रहा है। बजट में कर्ज लेकर निवेश करने की संभावना को बढ़ावा दिया गया है। यानी ब्याज आधारित अर्थव्यवस्था बनायी जा रही है।
सवाल: अगर आम नागरिकों की सुविधाओं में कटौती करके सरकार उसको प्राईवेट सेक्टर के हवाले कर रही है, तो वह टैक्स किस बात का ले रही है ?

जवाब: सुविधाएं देने के लिए ही सरकार प्राईवेट सेक्टर को ला रही है। प्राइवेट सेक्टर के निवेश के कारण ही लोगों को पहले से ज्यादा शिक्षण संस्थान मिलेंगे, पहले से ज्यादा हास्पिटल मिलेंगे, पहले से बेहतर शिक्षा और इलाज मिलेगा, पहले से ज़्यादा अच्छी ट्रेनें मिलेंगी, बस लोगों को उसके हिसाब से अपनी जेब ढ़ीली करनी होगी। कमाइए, खर्च कीजिए और सुविधाओं का लाभ उठाइए। इनमें बचत के लिए विकल्प बहुत सीमित हो जाएंगे।
सवाल: अल्पसंख्यक मंत्रालय के बजट में पिछली बार कटौती की गयी थी, इस बार भी की गयी। इसके पीछे कार्पोरेट को लाभ पहुंचाने की नीति है या कोई खास विचारधारा ?
जवाब: हर समूह की अपनी विचारधारा एवं दर्शन होता है। उनको अल्पसंख्यकों का फंड खत्म करना है, ताकि वे आर्थिक रूप से कमजोर हो जाएं। ये काम वे धीरे-धीरे कर रहे हैं ताकि यह लोगों की याददाश्त से मिटती जाए। जहां से वोट मिलना है वहां सुविधाएं बढ़ाई।
नोट- यह इंटरव्यू मशहूर कार्टूनिस्ट यूसुफ़ मुन्ना के फेसबुक पेज से उनकी इजाज़त से कॉपी किया गया है.
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