“काश ऐसा कोई मंज़र होता, मेरे कांधे पे तेरा सर होता…”
इन कालजयी पंक्तियों को अपनी रेशमी आवाज़ से दुनियाभर के दिलों में उतारने वाले मशहूर शायर ताहिर फ़राज़ (Tahir Faraz) अब हमारे बीच नहीं रहे। 72 वर्ष की आयु में मुंबई के एक अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर ने न केवल उनके गृह नगर रामपुर और जन्मभूमि बदायूं, बल्कि सात समंदर पार तक फैले उर्दू अदब के चाहने वालों को शोक में डुबो दिया है।
एक युग का अंत, एक आवाज़ की विदाई
ताहिर फ़राज़ महज़ एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू तहजीब का एक चमकता हुआ ‘ब्रांड’ थे। वे अपनी बेटी के इलाज और एक पारिवारिक विवाह में शामिल होने मुंबई गए थे, जहाँ अचानक सीने में दर्द उठने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। तमाम कोशिशों के बावजूद, नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। शनिवार की सुबह शायरी की दुनिया का वह सूरज अस्त हो गया, जिसने दशकों तक मुशायरों की महफ़िलों को रौशन किया था।
बदायूं की मिट्टी से रामपुर की रूह तक
29 जून 1953 को बदायूं में जन्मे ताहिर साहब के खून में ही शायरी थी। मात्र 8 साल की उम्र से अपने वालिद के साथ नशिस्तों (गोष्ठियों) में जाने वाले ताहिर ने 14 साल की उम्र में अपनी पहली मुकम्मल ग़ज़ल कह दी थी। उनके इब्तिदाई (शुरुआती) तेवर ही बता रहे थे कि वे इतिहास रचने आए हैं:
‘थे जो अपने हुए वो पराये, रंग किस्मत ने ऐसे दिखाये हम जो मोती किसी हार के थे, ऐसे बिखरे के फिर जुड़ न पाये’
शिक्षा के लिए वे अपने ननिहाल रामपुर आए और फिर यहीं के होकर रह गए। यहाँ उन्हें डॉ. शौक़ असरी रामपुरी और दिवाकर राही जैसे उस्तादों का सान्निध्य मिला, जिसने उनके फन को तराश कर हीरा बना दिया।
रूहानियत और आधुनिकता का संगम
ताहिर फ़राज़ की शायरी में एक अद्भुत संतुलन था। जहाँ एक ओर उनमें खानक़ाह नियाज़िया (बरेली) से जुड़ाव के कारण गहरी आध्यात्मिक गहराई थी, वहीं दूसरी ओर वे बशीर बद्र की आधुनिक शैली से भी प्रभावित थे। उनकी आवाज़ में वह खनक थी जो ग़ज़ल, भजन, नात और मनक़बत को एक समान चाव से सुनने पर मजबूर कर देती थी।
वैश्विक फलक पर रामपुर का गौरव
रामपुर, जो कभी ग़ालिब, दाग़ और अमीर मिनाई की महफ़िलों का गवाह रहा, उसे आधुनिक दौर में ताहिर फ़राज़ ने एक नई पहचान दी। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, खाड़ी देशों और पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया की यात्रा की। टी-सीरीज जैसी बड़ी कंपनियों ने उनकी आवाज़ को रिकॉर्ड किया, जिससे उनकी शायरी घर-घर पहुँची।
एक अधूरा ख़ला (शून्य)
सौलत पब्लिक लाइब्रेरी के काशिफ खां कहते हैं कि ताहिर फ़राज़ का जाना केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आवाज़ और उर्दू कविता के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत है। उनके जाने से शब्द ‘अनाथ’ हो गए हैं और वह तरन्नुम खामोश हो गया है जो महफ़िलों में जान फूंक देता था।
आज जब मुंबई की सरजमीं पर उन्हें सुपुर्द-ए-खाक करने की तैयारी हो रही है, तो दुनिया भर में बिखरे उनके चाहने वाले नम आँखों से बस यही दोहरा रहे हैं कि ग़ज़ल का वह ‘कारीगर’ अब हमेशा के लिए सो गया है, जिसने अपनी कलम से जज्बातों का ताजमहल तामीर किया था।
अलविदा ताहिर फ़राज़ साहब! आपकी शायरी दिलों की धड़कन बनकर हमेशा गूंजती रहेगी।
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