‘वंदे मातरम्’ पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का तेज लाल भारती और डॉ. सैयद अहमद खान ने किया स्वागत

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धार्मिक आस्था या अंतरात्मा के आधार पर गीत न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए; संविधान और मौलिक अधिकारों की रक्षा जरूरी

नई दिल्ली: ‘वंदे मातरम्’ से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की ओर से की गई टिप्पणी का सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने स्वागत किया है। तेज लाल भारती और ऑल इंडिया यूनानी तिब्बी कांग्रेस के सेक्रेटरी जनरल तथा उर्दू डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के कौमी सदर डॉ. सैयद अहमद खान ने कहा कि धार्मिक आस्था अथवा अंतरात्मा के आधार पर ‘वंदे मातरम्’ न गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।

तेज लाल भारती ने कहा कि संसद में ऐसा कोई कानून नहीं बनना चाहिए, जो संविधान की मूल भावना और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के विपरीत हो। उनके अनुसार, भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, सम्मान और अधिकार प्रदान करता है, चाहे उसकी जाति, बिरादरी या धार्मिक पहचान कुछ भी हो।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का अर्थ केवल संसद या विधानसभा में बहुमत के आधार पर कानून बनाना नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान की सर्वोच्चता, नागरिकों की स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का संरक्षण भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।

तेज लाल भारती ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को संवैधानिक अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अदालत की ओर से नागरिक अधिकारों और संविधान की सर्वोच्चता पर जोर दिए जाने से लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत होता है।

‘संविधान की भावना की अनदेखी नहीं हो सकती’

उन्होंने कहा कि भारत का संविधान देश के हर नागरिक को समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। ऐसे में किसी भी निर्णय या कानून में संविधान की मूल भावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

वहीं, डॉ. सैयद अहमद खान ने भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का स्वागत करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक आधार पर ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाता है तो उसके साथ जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिए और न ही उसके खिलाफ किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।

डॉ. खान ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी संवैधानिक भावना को रेखांकित करती है कि धार्मिक या अंतरात्मा से जुड़ी आपत्ति रखने वाले व्यक्ति को केवल गीत न गाने के कारण आपराधिक परिणामों का सामना नहीं करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इस टिप्पणी से यह संदेश जाता है कि देश में संविधान सर्वोच्च है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जिम्मेदारी है।

तेज लाल भारती और डॉ. सैयद अहमद खान ने संयुक्त रूप से संविधान में निहित समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा की आवश्यकता पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का स्वागत किया।

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