बात 2011 की है। मशहूर ब्रिटिश दैनिक द गार्जियन में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसने दुनिया भर में न्यायिक निष्पक्षता के विचार को झकझोर दिया था। इसराइल में शोधकर्ताओं ने एक हज़ार से अधिक पैरोल सुनवाइयों का विश्लेषण किया था जिसके चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार, जज साहबान खाने के अवकाश के तुरंत बाद क़ैदियों को रिहा करने में कहीं अधिक नरमी दिखाते थे, जबकि खाने से पहले के समय में उनके फ़ैसले बहुत कठोर होते थे। इसे “हंग्री जज इफ़ेक्ट (Hungry Judge Effect)” कहा गया। यह खुलासा इस कड़वी सच्चाई की ओर इशारा था कि न्याय जितना भी गंभीर प्रक्रिया हो, वह मानवीय कमज़ोरियों — जैसे थकान, भूख और समय के दबाव — से पूरी तरह मुक्त नहीं है।
यदि ऐसा ही अध्ययन भारत में किया जाए, तो शायद परिणाम और भी कड़वे निकलें। यहाँ भूख केवल पेट की नहीं, बल्कि कुर्सियों, आयोगों और सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले पदों की लालसा की भी हो सकती है। पिछले वर्षों में सुप्रीम कोर्ट के कुछ फ़ैसलों ने यह धारणा गहरी की है कि न्यायपालिका पर राजनीतिक प्रभाव या भविष्य के पदों की आशा असर डाल सकती है। 2020 में एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति के कुछ ही माह बाद राज्यसभा में नामांकन ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बड़े प्रश्न उठाए थे। और अब फिर एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश किसी बड़े पद की चाह और लालसा में जिस प्रकार अपने ही लिखे फ़ैसले के विपरीत बयान दे रहे हैं, उससे न्यायपालिका पर जनता का विश्वास डगमगाया है। इसी पृष्ठभूमि में मेरे मन में एक नया प्रश्न उठ रहा है — क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मानवीय जजों की तुलना में अधिक न्यायसंगत और पारदर्शी न्याय दे सकती है?
बहस को आगे बढ़ाने से पहले यह मान लेना आवश्यक है कि जज भी हमारी ही तरह इंसान होते हैं। हमारी सोच, हमारे फ़ैसले, हमारा दृष्टिकोण — सब उसी “डेटा” पर आधारित होते हैं, जो हमने अपने जीवन में इकट्ठा किया है। जिस वातावरण में हम पैदा हुए, जिस समाज में पले-बढ़े, जो शिक्षा हमें मिली, जिन किताबों और क़िस्सों ने हमारी परवरिश को रंग दिया, और जिन मान्यताओं को हमने अपने अंदर समाहित किया — यही सब हमारी सोच के एल्गोरिदम को तराशते हैं। इन्हीं अनुभवों के कोड से हम अपने विचार बनाते हैं, राय देते हैं और निर्णय लेते हैं। यही कारण है कि हमारा दृष्टिकोण पूरी तरह निष्पक्ष होना लगभग असंभव है। जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) अपने डेटा और प्रशिक्षण पर आधारित होती है, वैसे ही मनुष्य भी अपने जीवन के “डेटा सेट” पर निर्भर करता है। फर्क बस इतना है कि मशीन कोड में सीखती है और हम अनुभवों में। यानी हम सब, किसी न किसी रूप में, प्रोग्राम्ड इंसान हैं।
दुनिया भर के शोध बताते हैं कि हमारा पूर्वाग्रह किस तरह अनजाने में हमारे फ़ैसलों में घुल जाता है। अमेरिका में शोध से पता चला कि जब ज्यूरी श्वेत होती है तो अश्वेत आरोपियों को अधिक कठोर दंड मिलते हैं। यूरोप में शरणार्थियों के मामलों में जजों के राजनीतिक रुझान असर डालते हैं। भारत में भी जमानत आदेशों में बिना किसी स्पष्ट कानूनी तर्क के आश्चर्यजनक भिन्नताएँ देखी जा सकती हैं। कहने का मतलब है कि हमारे अपने न्यायिक ढाँचे में भी राजनीतिक और सामाजिक दबाव मौजूद हैं। जज साहब उसी वर्ग से आते हैं जहाँ संबंध और प्रभाव-शक्ति काम करते हैं। कॉलेजियम की व्यवस्था न्यायपालिका को सीधे राजनीति से तो बचाती है, पर लॉबिंग, सिफ़ारिश और रिश्तेदारी से नहीं। सेवानिवृत्ति के बाद उच्च पद मिलने की परंपरा भी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न है।
आज सच्चाई यह है कि अगस्त 2025 तक भारत में पाँच करोड़ दस लाख से अधिक मामले लंबित हैं। जेलों में तीन लाख चालीस हज़ार से ज़्यादा क़ैदी ऐसे हैं जो अब भी विचाराधीन हैं और उनमें से कई अपनी संभावित सज़ा से भी ज़्यादा समय जेल में बिता चुके हैं। जमानत याचिकाओं के फ़ैसले जज के मिज़ाज और रुझान पर अधिक और स्पष्ट कानूनी मानकों पर कम आधारित दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक नए आरंभ की उम्मीद जगा सकती है। कल्पना कीजिए — एक डिजिटल प्रणाली जो संविधान, कानूनों और लाखों न्यायिक फ़ैसलों को पलक झपकते परख सके, बिना किसी निजी पूर्वाग्रह, लालच या डर के। ऐसा सिस्टम न जाति जानता है, न राजनीतिक झुकाव, न सेवानिवृत्ति के बाद की कुर्सियाँ। यह सेकंडों में जटिल कानूनी सामग्री छान सकता है और अपने फ़ैसले का तर्क पारदर्शी रूप से प्रस्तुत कर सकता है।
दुनिया में यह अब केवल सपना नहीं रहा। चीन के “स्मार्ट कोर्ट” लाखों छोटे दीवानी व प्रशासनिक मामलों को संभालते हैं और जज को मसौदा फ़ैसले उपलब्ध कराते हैं। एस्टोनिया ने सात हज़ार यूरो तक के संविदात्मक विवादों के लिए डिजिटल जज आज़माए हैं। अमेरिका और यूरोप में ज़मानत और सज़ा तय करने में मशीन लर्निंग का इस्तेमाल हो रहा है। फ़िलहाल ये सिस्टम अंतिम फ़ैसले नहीं देते, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में सहायता ज़रूर कर रहे हैं। भारत के लिए भी ऐसा प्रयोग क्रांतिकारी साबित हो सकता है।
लेकिन यह सब इतना आसान नहीं होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता वही सीखती है जो हम उसे सिखाते हैं। अगर अतीत के फ़ैसले जाति, बिरादरी या वर्गीय पूर्वाग्रह से प्रभावित रहे हैं, तो मशीन भी वही ग़लती दोहरा सकती है। अमेरिका में 2018 में प्रो पब्लिका ने खुलासा किया कि वहाँ ज़मानत तय करने में उपयोग किए गए एक एल्गोरिदम ने अश्वेत अभियुक्तों को अधिक ख़तरनाक बताया। भारत में भी यदि डेटा साफ़ नहीं हुआ, तो ऐसा ख़तरा और बढ़ जाएगा। एक बात और है — न्याय केवल क़ानूनी फ़ार्मूले नहीं चाहता। सज़ा में दया, सुधार का अवसर और मानवीय परिस्थितियों को समझना भी शामिल है। एक पहला अपराध करने वाला और एक पेशेवर अपराधी क़ानूनी रूप से समान हो सकते हैं, पर मानवीय न्याय दोनों में अंतर करता है। अगर AI सिर्फ़ आँकड़ों पर निर्भर करे तो फ़ैसले क़ानूनी तो होंगे लेकिन अमानवीय और कठोर भी हो सकते हैं।
ज़िम्मेदारी का प्रश्न भी अहम है। अगर कोई एल्गोरिदम ग़लती करे तो जवाबदेही किसकी होगी — कोडर, अदालत या राज्य की? ऐसा न हो कि वैसी ही अविश्वास की स्थिति बने जैसी आज ईवीएम और चुनाव आयोग के प्रति जनता में है। सबसे उचित हल शायद पूरी तरह मशीन को न्यायालय में बैठाना नहीं, बल्कि मानव और AI का संयुक्त मॉडल है। AI वह काम करे जिसमें इंसान कमज़ोर है — लाखों मिसालों का त्वरित विश्लेषण, विरोधाभासों की पहचान, छिपे पूर्वाग्रह उजागर करना — और जज वह करे जो मशीन नहीं कर सकती — संवेदनशीलता, संविधानिक मूल्य, करुणा और नैतिक संतुलन।
इस साझी प्रणाली के लिए आवश्यक है कि प्रशिक्षण डेटा पारदर्शी, व्यापक और हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला हो। एल्गोरिदम खुले और जाँच योग्य हों ताकि उच्च न्यायालयों में अपील संभव हो। और सबसे बढ़कर, AI न्याय प्रणाली पर नज़र रखने के लिए एक स्वतंत्र निकाय हो।
AI जज पर बहस दरअसल मौजूदा न्यायिक व्यवस्था से उपजी निराशा है। हम चाहते हैं कि अदालतों में फ़ैसले बिना दबाव, पक्षपात या लोभ के दिए जाएँ। अगर तकनीक के उपयोग से जनता का विश्वास वापस आ सकता है, तो इसे गंभीरता से आज़माना चाहिए। अगर हमने यह अवसर गंवा दिया तो “हंग्री जज इफ़ेक्ट” — चाहे वह दोपहर के भोजन का हो या भविष्य के पद का — हमारे फ़ैसलों को बिगाड़ता रहेगा।
- No Visa? No Problem! 12 Dream Destinations Indians Can Visit in 2026 with Just a Flight Ticket

- “तालीम को निगल गया ज़ायक़ा”- एक तल्ख़ मगर सच्चाई, ख़ुद-एहतेसाब करे-इस्लाम अहमद मंसूरी

- हम इंसानियत के सबसे पुराने और सबसे बड़े अन्याय को खत्म करने में नाकाम क्यों हो रहे हैं? – शोभा शुक्ला

- The Right to Health: Reclaiming Justice, Equity, and Human Dignity

- जश्न-ए-सर सैयद: सैयद डे-17 अक्टूबर का दिन अलीगढ़ की फ़िज़ाओं में एक रूहानी, शैक्षिक और तहज़ीबी पर्व बनकर उतरता है

