जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने 2026 को ‘न्याय, शांति, एकता और समावेशी विकास’ का वर्ष बनाने की अपील की

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जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, मुस्लिम-ईसाई हिंसा और सर्दी में गरीबों की परेशानी पर चिंता जताई। 2026 को न्याय, शांति व एकता का वर्ष बनाने का अपील।

नई दिल्ली, 03 जनवरी 2026: जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने अपने मुख्यालय में आयोजित मासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश में बढ़ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सर्दी में गरीबों की कठिनाइयों और धार्मिक एवं क्षेत्रीय अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही लक्षित हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त की।

जमाअत के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने कहा कि भारत हमेशा से धार्मिक सह-अस्तित्व और सांप्रदायिक सौहार्द की समृद्ध परंपरा वाला देश रहा है। उन्होंने कहा, “हमारे धार्मिक नेताओं और संस्थानों ने विविधता में एकता को हमेशा बढ़ावा दिया है, लेकिन अब यह विरासत खतरे में है।” उन्होंने सांप्रदायिक भाषणों, इस्लामोफोबिया, नफरती मामलों, भीड़ हिंसा और धार्मिक भेदभाव की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई।

साउथ एशिया जस्टिस कैंपेन की इंडिया पर्सिक्यूशन ट्रैकर 2025 रिपोर्ट का हवाला देते हुए प्रोफेसर इंजीनियर ने कहा कि धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों, के खिलाफ राज्य और गैर-राज्य तत्वों द्वारा उत्पीड़न में तेज़ी आई है। इसमें गैर-कानूनी हत्याएं, भीड़ हिंसा, मनमानी गिरफ्तारियां, बदले की भावना से की गई तोड़फोड़, नफरत फैलाने वाले बयानों और जबरन निष्कासन जैसी घटनाएं शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक शक्तियां धर्म को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर धार्मिक समुदायों के बीच खाई पैदा कर रही हैं। “हमें विश्वास है कि भारत के लोगों में इतनी समझ और नैतिक शक्ति है कि वे इन सांप्रदायिक ताकतों को पराजित कर सकते हैं,” उन्होंने कहा।

प्रोफेसर इंजीनियर ने बताया कि जमाअत-ए-इस्लामी हिंद धार्मिक जन मोर्चा और सद्भावना मंच जैसी पहलों के माध्यम से इंटरफेथ संवाद और सामाजिक एकता के लिए काम कर रही है। उन्होंने घोषणा की कि 2026 को ‘सभी के लिए न्याय, शांति, एकता और समावेशी स्थायी विकास का वर्ष’ के रूप में मनाया जाएगा, जिससे सामाजिक सद्भाव, न्याय और भाईचारे की भावना को और मज़बूत किया जा सके।

सर्दियों में गरीबों की कठिनाइयों को उठाते हुए जमाअत के उपाध्यक्ष मलिक मोअतसिम खान ने बताया कि संगठन समान विचारधारा वाले समूहों के साथ मिलकर उत्तर और पूर्वी भारत में कंबल वितरण अभियान चला रहा है। उन्होंने कहा, “ज़रूरतमंदों को धर्म, जाति या पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना मदद दी जा रही है।”

उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों से सर्दी के मौसम में राहत उपाय तेज़ करने, नाइट शेल्टरों की संख्या बढ़ाने, गर्म कपड़े और भोजन उपलब्ध कराने, मोबाइल हेल्थ यूनिट तैनात करने और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मज़बूत करने की अपील की। साथ ही, नागरिकों से भी दान, स्वंयसेवा और सामुदायिक मदद के ज़रिए योगदान देने की अपील की।

मलिक मोअतसिम खान ने देश के विभिन्न हिस्सों में ईसाई समुदाय के खिलाफ बढ़ती हिंसा की घटनाओं पर भी चिंता जताई और कहा, “हम संकट की इस घड़ी में ईसाई भाइयों के साथ खड़े हैं।” उन्होंने चेतावनी दी कि प्रार्थना सभाओं में रुकावट, दफनाने में विवाद और धर्मांतरण विरोधी कानूनों के दुरुपयोग जैसी घटनाएं समाज में अविश्वास का माहौल पैदा कर सकती हैं।

उन्होंने त्रिपुरा के एमबीए छात्र एंजेल चकमा की लिंचिंग की घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे “नस्लीय भेदभाव पर आधारित नफरती अपराध” बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे हमले न केवल समाज की विफलता को दर्शाते हैं, बल्कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कमजोरी को भी उजागर करते हैं।

जमाअत ने उत्तराखंड सरकार से दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी, कड़े कानूनी प्रावधान लागू करने, पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा न्याय और मुआवज़े की गारंटी की मांग की।
मलिक खान ने कहा, “भारत को नस्लीय और नफरत पर आधारित हिंसा के खिलाफ एक व्यापक राष्ट्रीय कानून की तत्काल आवश्यकता है,” पैगंबर मुहम्मद का हवाला देते हुए उन्होंने कहा — “किसी व्यक्ति को दूसरे पर श्रेष्ठता केवल नेकी के आधार पर ही हो सकती है।”

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