धर्मेंद्र: हिंदी सिनेमा के ही-मैन की बेमिसाल विरासत

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“लोग अच्छे हैं बहुत, दिल में उतर जाते हैं
इक बुराई है, तो बस ये है कि मर जाते हैं “

धर्मेंद्र- इस नाम में ही भारतीय सिनेमा की छह दशकों से भी लंबी दास्तान की गूंज है। 1960 के दशक में फिल्मों में कदम रखने वाले धर्मेंद्र ने तीन सौ से ज़्यादा फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरा। अब, नई फिल्म ‘इक्कीस’ के साथ उनकी सिनेमाई पारी संभवतः अपने अंतिम अध्याय पर है, लेकिन धर्मेंद्र का सफर केवल फिल्मों तक सीमित नहीं है; यह एक अदम्य इंसानी जज़्बे, नैतिक मूल्यों और सच्ची इंसानियत की मिसाल भी है।

छवि, कला और उपेक्षित सम्मान

ग्रीक देवताओं जैसे आकर्षक व्यक्तित्व वाले धर्मेंद्र को अकसर उनके रूप के लिए सराहा गया, परंतु अभिनेता के रूप में उनकी गहराई और संवेदना का सम्यक मूल्यांकन हमेशा नहीं हुआ। इतनी जबरदस्त अभिनय यात्रा के बावजूद उन्हें मुख्यधारा के बड़े फिल्म पुरस्कार कम ही मिले। एकमात्र बड़ा सरकारी सम्मान—पद्म भूषण—मिला, मगर दादा साहब फाल्के अवार्ड आज तक नहीं। सत्यकाम, अनुपमा, बंदिनी जैसे संजीदा किरदारों से सजी फिल्मों से लेकर शोले, चुपके-चुपके, प्रतिज्ञा जैसी मनोरंजनयुक्त फ़िल्में, और गुलामी, हुकूमत जैसी एक्शन फिल्मों तक उनका सफर हर रंग और हर जनरेशन के दर्शकों के दिल में जगह बनाता है।

असाधारण फिल्मी सफर

राजेश खन्ना की दीवानगी या अमिताभ के ‘एंग्री यंग मैन’ दौर में भी धर्मेंद्र की लोकप्रियता कभी फीकी नहीं पड़ी। अपनी बहुमुखी प्रतिभा और बोल्ड किरदारों से वे हर दौर में प्रासंगिक बने रहे।

उनकी बहुचर्चित फिल्मों की सूची इतनी लंबी है कि कुछ का ही ज़िक्र करना संभव है:

  • सत्यकाम, अनुपमा, बंदिनी, हक़ीक़त, फूल और पत्थर
  • आंखें, जीवन मृत्यु, नया ज़माना, मझली दीदी
  • मेरा गांव मेरा देश, देवर, यकीन, लोफर
  • दोस्त, समाधि, शोले, जुगनू, यादों की बारात
  • चुपके-चुपके, चरस, प्रतिज्ञा, दिल्लगी, किनारा
  • गुलामी, हथियार, जॉनी गद्दार

इन रोल्स में धर्मेंद्र की ‘रेंज’ और प्रभाव दोनों साफ़ दिखाई देते हैं। ये सूची दरअसल एक कलाकार की कला-यात्रा का संक्षिप्त परिचय मात्र है।

धर्मेंद्र: बेबाक, सहज और इंसानियत की मिसाल

अभिनय के साथ-साथ धर्मेंद्र अपनी नेकदिली, जिंदादिली और मददगार स्वभाव के लिए भी याद किए जाएंगे। राजनीति में आने के दौरान उन्होंने सेक्युलरिज़्म की अद्भुत मिसाल कायम की, जब एक मुस्लिम बहन के सवाल पर धर्मेंद्र ने कहा—“मुझसे बड़ा सेक्युलर कोई नहीं होगा, मैं आप लोगों का नुमाइंदा बनकर पार्टी में जा रहा हूँ”। वे सांसद रहे, लेकिन कभी नफरत की राजनीति नहीं की—न बयानबाज़ी में, न व्यवहार में।

आज, जब ‘नए भारत’ के तमाम कलाकार सियासी फायदा उठाने की होड़ में अपनी तकरीरें बदल रहे हैं, धर्मेंद्र वैसा ही रहे जैसे थे—साफ, दिलदार, विचारों पर डटे हुए। न कभी समझौता, न दिखावा—वो ही-मैन सिनेमा में भी थे, ज़िंदगी में भी।

रचनात्मक विरासत और विदाई

धर्मेंद्र सिर्फ अभिनेता या राजनेता ही नहीं, पहले और आखिर तक एक बेहतरीन इंसान रहे। वह हमेशा सादगी, ईमानदारी और इंसानियत की मिसाल बने रहे।

रईस फ़रोग़ की इन पंक्तियों में सारा दर्द और सुंदरता समा जाती है—
“लोग अच्छे हैं बहुत, दिल में उतर जाते हैं
इक बुराई है, तो बस ये है कि मर जाते हैं।”

श्रद्धांजलि, धर्मेंद्र। आप हिंदी सिनेमा और करोड़ों दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।

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