“अगर कोई एक शरबत है जो एकता और भाईचारा की पहचान बन चुका है, जो हर ज़ायके को जोड़ता है, और जो न हिन्दू है न मुसलमान, बल्कि है क़तरा क़तरा हिंदुस्तान —तो वो है रूह अफ़ज़ा।”
लेकिन आज का दौर थोड़ा अजीब है। एक ऐसा शरबत जो सौ साल से भी ज़्यादा वक़्त से हिंदुस्तान की प्यास बुझा रहा है, आज अचानक निशाने पर आ गया है। वजह न उसका स्वाद है, न ही उसके इंग्रेडिएंट्स—बस ये है कि वो आज के राजनीतिक स्वाद के मुताबिक नहीं है।
जी हां, बाबा रामदेव—योग सिखाने वाले, पतंजलि बेचने वाले और केसरिया कपड़ों में लिपटे बाज़ार में देशभक्ति के नाम पर तेल साबुन बेचने के उस्ताद—अब रूह अफ़ज़ा को लेकर परेशान हैं। हाल ही में उन्होंने रूह अफ़ज़ा की ‘सांस्कृतिक हैसियत’ पर सवाल उठा दिए। कुछ लोगों को ये बस एक हल्की-फुल्की टिप्पणी लगी, लेकिन जो इतिहास को जानते हैं, उनके लिए ये एक गहरी चोट थी।
तो आइए, डर नहीं, बल्कि तथ्यों की एक घूंट लेते हैं—और जानते हैं रूह अफ़ज़ा की असली कहानी।
एक देसी इलाज, जो बना हर घर की मिठास
रूह अफ़ज़ा का जन्म किसी फैक्ट्री में नहीं, बल्कि दिल्ली की पुरानी गलियों में एक हकीम के छोटे से क्लिनिक में हुआ। साल था 1907। हकीम हाफ़िज़ अब्दुल मजीद ने गर्मी से बेहाल लोगों के लिए गुलाब, केवड़ा, खस और चंदन जैसे ठंडक देने वाले प्राकृतिक तत्वों से एक खास शरबत तैयार किया।
उन्होंने इसका नाम रखा “रूह अफ़ज़ा”—यानि आत्मा को ताज़गी देने वाला। ये सिर्फ एक पेय नहीं था, बल्कि इलाज था, एहसास था।
हकीम साहब के इंतकाल के बाद उनकी पत्नी और फिर उनके बेटे हकीम अब्दुल हमीद ने इस मिशन को आगे बढ़ाया।
हकीम अब्दुल हमीद: तबीब, तालीम देने वाले, और सच्चे देशभक्त
जब 1947 में बंटवारे के दौरान बहुत से लोग पाकिस्तान चले गए, तो हकीम अब्दुल हमीद ने हिंदुस्तान में रहना चुना। उन्होंने हमदर्द को एक वक्फ संस्था बना दिया—यानि एक जनहित में चलने वाला ट्रस्ट।
1962 में उन्होंने जामिया हमदर्द की स्थापना की, जो आज यूनानी और फार्मास्युटिकल साइंस का एक बड़ा केंद्र है। देश ने उनके योगदान को पहचाना—उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण से नवाज़ा गया।
और रूह अफ़ज़ा? वो बन गया भारत की साझी संस्कृति का मीठा प्रतीक। ईद हो या होली, शादी हो या पारिवारिक जलसा—हर मौके पर रूह अफ़ज़ा का स्वाद शामिल होता रहा।
स्वाद से ज़्यादा, यह है संस्कृति की पहचान
जब आप रमज़ान में ठंडे दूध में रूह अफ़ज़ा डालते हैं, या होली में इसे फालूदा में मिलाते हैं, तो आप सिर्फ शरबत नहीं बना रहे—बल्कि एक रस्म निभा रहे हैं, जो मज़हबी दीवारों को तोड़ती है।
1947 के दंगों में, जब लाखों लोग बेघर हो रहे थे, तब रूह अफ़ज़ा की बोतलें हिन्दू-मुस्लिम वालंटियर्स साथ लेकर चलते थे—यह सिर्फ प्यास बुझाने के लिए नहीं, बल्कि दिलों को ठंडक देने के लिए थी।
पाकिस्तान के अस्पतालों में आज भी हीटस्ट्रोक के मरीज़ों को रूह अफ़ज़ा दी जाती है। बांग्लादेश में ये शादियों की खास मिठास है। और खाड़ी देशों में रमज़ान के दस्तरख़्वान पर इसका होना लाज़मी है।
ये एक शरबत नहीं, बोतल में बंद तहज़ीब है।
और फिर आ गए बाबा रामदेव.
अब साल है 2025।
जहां देश पहले ही बिरयानी और हलाल पर बहसों में उलझा हुआ है, वहीं अब एक और मुद्दा खड़ा हो गया है—रूह अफ़ज़ा बनाम पतंजलि का एलोवेरा जूस।
बाबा रामदेव—जो कभी एलोपैथी को COVID मौतों का ज़िम्मेदार बताते थे और फिर चुपके से पतंजलि कोरोनिल लॉन्च कर देते हैं—अब कह रहे हैं कि सच्चे “देसी” लोगों को “भारतीय” पेय ही पीना चाहिए।
मतलब ये कि एक शरबत जो सौ साल से लोगों की जान बचा रहा है, अब “गैर-देसी” बन गया?
यह वही बाबा हैं जो ‘पतनजली जीन्स’ भी बेचते हैं—और अब ‘राष्ट्रवाद’ की सील लगा कर पानी की बोतलें भी!
मुद्दा क्या है? ये सिर्फ एक पेय की बात नहीं
जब रूह अफ़ज़ा को निशाना बनाया जाता है, तो दरअसल एक सोच को मिटाने की कोशिश होती है—वो सोच जो भारत को गंगा-जमुनी तहज़ीब वाला बनाती है।
अगर रूह अफ़ज़ा का लाल रंग दिक्कत बन गया है, तो फिर कल केसरिया या हरा रंग भी निशाने पर आ सकता है?
अब ये स्वाद की नहीं, पहचान मिटाने की साज़िश है।
इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता
रूह अफ़ज़ा ने कभी खुद को सिर्फ मुस्लिम या किसी मज़हब का पेय नहीं कहा। ये हर घर की पहचान बना, हर त्योहार में शामिल हुआ, हर मेहमान की खातिरदारी में सबसे आगे रहा।
आज जो लोग इसे मज़हबी पहचान से परिभाषित कर रहे हैं, वो नासमझ नहीं—बल्कि डरे हुए लोग हैं। और मज़े की बात ये है कि बाबा रामदेव की टिप्पणी के बाद रूह अफ़ज़ा की बिक्री और भी बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर लोग इसकी यादें साझा कर रहे हैं। रील्स बन रही हैं, #RoohAfzaForever ट्रेंड कर रहा है। जो लोग सालों से नहीं पिए थे, उन्हें अब इसकी तलब हो रही है—सिर्फ स्वाद की नहीं, उस हिंदुस्तान की जो वो याद करते हैं।
रूह अफ़जा पीजिए, ज़हर मत उगलिए
भारत को आज रूह अफ़ज़ा जैसे और प्रतीकों की ज़रूरत है—जो गर्म माहौल में ठंडक दें, कड़वे बहसों में मिठास भरें, और साझा विरासत को सहेजें।
अगर किसी को रूह अफ़ज़ा हज़म नहीं हो रही, तो दिक्कत शरबत में नहीं है। दिक्कत उनकी सोच में है—जो इतिहास, विविधता और सच्चाई को पचा नहीं पा रही है।
तो इस गर्मी में, नफ़रत को कहिए गुडबाई।
आईए ठंडी रूह अफ़ज़ा पीते हैं, और जश्न मनाते हैं—अपने भारत का, उसकी विरासत का, उसकी मोहब्बत का, क्योंकि रूह-अफ़ज़ा की हर घूंट में मोहब्बत है तो हर क़तरे में हिंदुस्तान!
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