ख़लीफ़ा हज़रत उमर के ज़माने में एक बार बैतुल माल मतलब राजकीय कोष से सबको कपड़े बांटे गए। सब ने कुर्ता सिलवाया। हज़रत उमर के कुर्ते का दामन कुछ ज्यादा ही बड़ा नजर आ रहा था। भरे दरबार में एक सहाबी ने सवाल कर दिया, ” उमर , हम सभी को सिलने के लिए एक नाप के कपड़े मिले फिर हमारा कुर्ता छोटा और तुम्हारा कुर्ता इतना बड़ा कैसे निकला?” हाकिम ए वक्त़ से पूछे गए इस सीधे सवाल से पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। हज़रत उमर ख़ामोश रहे और उनके बेटा हज़रत अब्दुल्ला खड़े हुए और कहा, “मैंने अपना कुर्ता छोटा सिया है बाकी कपड़ा उनके डील डोल को देखते हुए उनको दे दिया है”. उनके इस जवाब से दरबार में मौजूद सभी लोग संतुष्ट हो गए।
यह था इस्लामिक अकाउंटिबिलिटी का मयार। सवाल हाकिम ए वक्त़ से भी किया जा सकता था और उनको भी प्रजा के प्रति जवाबदेह होना पड़ता था। क्या आज हम ऐसा सोच सकते हैं? शायद नहीं । हाकिम ए वक्त़ तो क्या आज आप चंदे की उगाही पर ऐश काटने वाले छोटे से छोटे मौलवियों से यह नहीं पूछ सकते। आज किसी से यह नहीं पूछा जा सकता कि मदरसा और मस्जिदों के नाम पर जो सालाना करोड़ों रुपए चंदा इकट्ठा होता है, जाता कहॉं है? क्योंकि क़ौम की हालत तो बदली नही बस कुछ लोग ऐश व आराम की जिंदगी बसर करते, फाइव स्टार होटल और बिजनेस क्लास हवाई सफर करते हुए नज़र आते हैं। पिछले साल कोरोना संक्रमण फैलाने के विवाद में फंसी एक मुस्लिम तंज़ीम के एक रहनुमा के आलीशान फार्म हाउस का फु़टेज टीवी चैनलों पर दिखा था, वह कहां से आया ? यह भी छोड़िए आप राना अय्यूब से नहीं पूछ सकते कि एनजीओ को मिले पैसों को उन्हों ने अपने पिता के नाम से एफडी क्यों करा दिया? इस तरह की और बहुत सारी गै़र सरकारी संगठन हैं जो समाज सेवा के नाम पर सिर्फ़ अपना पेट भरते हैं।

यह लोग जानते हैं कि ग़रीब, मिस्कीन और यतीमों के नाम पर जो पैसे जमा होते हैं उसे अपने या अपने परिवार वालों पर ख़र्च करना कितना बड़ा गुनाह है। कु़रान में कई जगह इस से रोका गया है। लेकिन यह हज़रात अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आते। चंदे का गोरखधंधा और जगह भी होता है। कश्मीरी पंडितों के नाम पर भी अनगिनत पैसा इकट्ठा किया गया लेकिन आजतक एक भी गरीब कश्मीरी पंडित का पुनर्वास नहीं हुआ। मंदिरों के नाम पर भी करोड़ों रुपए जमा होते हैं लेकिन मैं उधर कोई सवाल खड़ा करना नहीं चाहता। मैं तो बस ख़ुद के दामन में झॉंकना चाहता हूं.
मेरा तो मानना है कि अब हर किसी से सवाल किया जाना चाहिए और जवाबदेही तय की जानी चाहिए। मेरी ऐसे संगठनों से मांग है कि वो हर साल अपनी आमदनी और ख़र्चे का हिसाब पब्लिक करे ताकि यह मोहतरमाएं या हज़रात दुनियां और आखि़रत दोनों जगह सुर्ख़रू हो सकें। सरकार को भी चाहिए कि इस बाबत कोई क़ानून लाये।
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