“तालीम को निगल गया ज़ायक़ा”- एक तल्ख़ मगर सच्चाई, ख़ुद-एहतेसाब करे-इस्लाम अहमद मंसूरी

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आज अगर मुस्लिम मोहल्लों, बस्तियों और बाज़ारों पर नज़र डालें तो हर जानिब बिरयानी, ज़र्दा, पुलाव, क़ोरमा, नहारी, स्टू, क़ीमा, पाया जैसे लज़ीज़ पकवानों की भरमार नज़र आती है। लम्बी दाढ़ियाँ, ऊँची टोपियाँ, सफ़ेद कुर्ता-पाजामा पहने नौजवान और बुज़ुर्ग दुकानदार बड़े शौक़ और फ़ख़्र से यह कार-ओ-बार करते दिखाई देते हैं। ज़ायक़ा इतना कि आदमी इनाम तो क्या, अपना वजूद तक इन पकवानों के नाम करने को तैयार हो जाए।

मगर सवाल यह है कि क्या हमारी पहचान सिर्फ़ ज़ायक़े तक महदूद होकर रह गई है?

अगर यही शौक़, यही लगन और यही मेहनत तालीम के लिए होती, तो आज हमारे बाज़ार किताबों से आबाद होते, न कि सिर्फ़ देगचियों और कढ़ाहियों से।

आज हमारे उर्दू बाज़ारों में किताबें बहुत कम और पकवान बहुत ज़्यादा बिकते हैं। तालीम ग़ायब होती जा रही है। मिंबरों से डराया ज़्यादा जा रहा है, जगाया कम। फ़तवे सस्ते हो गए हैं और लिबास व दावत शान बन चुकी है।

शादियों की बारातें देख लो,
वलीमों की दावतें देख लो,

जनाज़ों के बाद भी “कड़वी रोटी” अब ज़ायक़े में बदल चुकी है। और फिर भी कहा जाता है कि “मुसलमान परेशान हैं”।

सवाल यह है कि हमारी परेशानी असल में है क्या?

मस्जिद की सीढ़ियों से उतरते ही चारों तरफ़ बाज़ार सजे होते हैं—किताब ढूँढिए तो मायूस लौटना पड़ता है, लेकिन खाना, कपड़ा, चूड़ियाँ, जेवर सब कुछ फ़रावानी से मिल जाता है। अब तो बिरादरी और जाति आधारित तंज़ीमें भी इस्लाह-ए-मुआशरा से पीछे हट चुकी हैं। सोच यह बन गई है—
“दुनिया बर्बाद हो तो होने दो, आखिर जन्नत तो मरने के बाद मिल ही जाएगी, मदरसे के बच्चे कुरानख़्वानी कर देंगे, दुआ-ए-मग़फिरत हो जाएगी।”

क्या बस यही हमारी ज़िम्मेदारी है?

कभी हमने सोचा… हमने अपनी क़ौम के बच्चों को तालीम के लिए कितना आगे बढ़ाया? हमारे इलाक़ों में कितनी लाइब्रेरियाँ क़ायम हुईं? कितने स्कूल व मदरसे दीनी तालीम के साथ असरी तालीम भी दे रहे हैं?

हक़ीक़त यह है कि आज चाय की दुकानें हैं, बिरयानी की दुकानें हैं, मगर तालीमी मराक़िज़ नहीं हैं। ख़ुदा की क़सम, आज हमारी क़ौम मुश्किल से दो-तीन फ़ीसद ही पढ़ी-लिखी रह गई है। जिस दिन हमारी बेटियाँ और बेटे 25 फ़ीसद भी तालीमयाफ़्ता हो गए, उस दिन एक नई तारीख़ लिखी जाएगी। बहुत कम लोगों को मालूम है कि जब भारत आज़ाद हुआ था, उस वक़्त सबसे ज़्यादा तालीमयाफ़्ता समाजों में मुसलमान सबसे आगे थे—करीब 35 फ़ीसद। हमारी ही क़ौम से सबसे ज़्यादा IAS, IPS, जज और मजिस्ट्रेट निकले थे। आज जब यह सुनता हूँ कि UPSC में 28 मुस्लिम तलबा कामयाब हुए, तो दिल से दुआ निकलती है और आँखें भर आती हैं। यही वो रौशनी है, जो अँधेरों को खत्म कर सकती है।

अब वक़्त आ गया है…

उठो, जागो और अपनी क़ौम के लिए कुछ कर गुज़रने का इरादा करो।

अल्लाह ने हमें सिर्फ़ गोश्त, बिरयानी और मुर्ग़ मुसल्लम खाने के लिए नहीं भेजा, बल्कि इल्म, अमल और ख़िदमत के लिए भेजा है। अपनी क़ौम के लिए कुछ करके भी दिखाओ ताकि हमारी पहचान दुकानों से नहीं, डिग्रियों से हो।

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