खुदा के वजूद पर जावेद अख्तर vs मुफ्ती शमाइल नदवी की सदी की बड़ी बहस

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The great debate of the century on the existence of God: Javed Akhtar vs. Mufti Shamail Nadvi.
खुदा के वजूद पर जावेद अख्तर vs मुफ्ती शमाइल नदवी की सदी की बड़ी बहस

दिल्ली में जावेद अख्तर और मुफ्ती शमाइल नदवी के बीच ‘क्या खुदा का वजूद है?’ पर ऐतिहासिक लाइव बहस। सौरभ द्विवेदी के संचालन में तर्क vs विश्वास का महासंग्राम।

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ‘क्या ईश्वर का अस्तित्व है?’ विषय पर एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक अकादमिक संवाद संपन्न हुआ। इस लाइव डिबेट में मशहूर गीतकार और तर्कवादी जावेद अख्तर का सामना जाने-माने इस्लामी विद्वान मुफ्ती शमाइल नदवी से हुआ। वरिष्ठ पत्रकार सौरभ द्विवेदी द्वारा संचालित इस कार्यक्रम ने वैचारिक मतभेदों के बावजूद शालीनता और तर्कपूर्ण संवाद की एक नई मिसाल पेश की है।

बहस की शुरुआत कैसे हुई?

यह वैचारिक टकराव अगस्त 2025 में कोलकाता में शुरू हुआ था, जब मुफ्ती शमाइल नदवी ने जावेद अख्तर के एक सार्वजनिक बयान के बाद उन्हें सीधी बहस की चुनौती दी थी। मुफ्ती का कहना था कि वे बिना किसी धार्मिक ग्रंथ का हवाला दिए, केवल शुद्ध तर्क (Pure Logic) के आधार पर ईश्वर के वजूद को साबित करेंगे। महीनों के इंतज़ार के बाद, दिल्ली के इस मंच पर दोनों दिग्गजों ने अपने-अपने विचारों को दुनिया के सामने रखा।​

मुफ्ती शमाइल और जावेद अख्तर के मुख्य तर्क

मुफ्ती शमाइल नदवी ने ‘कॉन्टिंजेंसी’ (आकस्मिकता) का सिद्धांत पेश करते हुए तर्क दिया कि ब्रह्मांड की हर चीज़ किसी न किसी कारण पर निर्भर है, इसलिए एक ऐसी ‘अनिवार्य सत्ता’ (Necessary Being) का होना तार्किक रूप से आवश्यक है जो खुद किसी पर निर्भर न हो। इसके विपरीत, जावेद अख्तर ने ‘विश्वास’ और ‘मान्यता’ के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि बिना प्रमाण के किसी भी बात को स्वीकार करना ‘अंधविश्वास’ है। उन्होंने प्रकृति में व्याप्त अन्यायों का उल्लेख करते हुए एक न्यायप्रिय ईश्वर की अवधारणा पर सवाल उठाए।

सोशल मीडिया पर वायरल रिएक्शन

यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस बहस को लाखों लोगों ने लाइव देखा, जिससे यह इस साल का सबसे चर्चित बौद्धिक कार्यक्रम बन गया है। विशेष रूप से मुफ्ती शमाइल द्वारा दिए गए ‘गुलाबी बॉल’ और ‘अनंत प्रतिगमन’ के तर्कों की क्लिप्स युवाओं के बीच काफी वायरल हो रही हैं। जानकारों का मानना है कि इस तरह के संवाद समाज में वैज्ञानिक सोच और धार्मिक समझ के बीच एक सेतु का काम करते हैं।