नूरजहाँ: संगीत की मलिका का 99वां जन्मदिन
आज भी जब भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत और फिल्मों की बात होती है, तो नूरजहाँ का नाम बेमिसाल अंदाज़ में लिया जाता है । 21 सितंबर 1926 को कसूर (अब पाकिस्तान) में जन्मी मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहां का असली नाम अल्लाह वसई था। उन्होंने अपनी आवाज़ और अभिनय से जिस तरह श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया, वह उन्हें हमेशा के लिए अविस्मरणीय बना गया ।
सुनहरी करियर की शुरुआत
नूरजहाँ ने बचपन से ही संगीत की दुनिया में कदम रखा । 1930 के दशक में ही वे फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में दिखीं । उनकी गायकी इतनी सशक्त थी कि उन्होंने चंद ही सालों में फिल्म इंडस्ट्री में अपनी खास पहचान बना ली । पंजाबी और उर्दू फिल्मों से शुरुआत करते हुए उन्होंने बंबई (अब मुंबई) जाकर हिंदी सिनेमा में भी धूम मचाई ।
मलिका-ए-तरन्नुम
नूरजहाँ को उनके चाहने वालों ने मलिका-ए-तरन्नुम (संगीत की मलिका) की उपाधि दी। उनकी आवाज़ में मिठास, गहराई और सुरों का ऐसा जादू था कि लोग उनकी गज़लों, ठुमरियों और फिल्मी गीतों को सुनकर खो जाते थे । वह सिर्फ एक गायिका ही नहीं, बल्कि बेहतरीन अभिनेत्री भी थीं । उन्होंने अनमोल घड़ी, दुलारी, और हिंडोला जैसी फिल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों के दिल जीते।
विभाजन और पाकिस्तान में नई पहचान
साल 1947 में भारत-पाकिस्तान के बटवारे के बाद नूरजहाँ पाकिस्तान चली गईं। वहां उन्होंने पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। गायिका और अभिनेत्री के रूप में उन्होंने सैकड़ों फिल्मों और अनगिनत गानों के जरिए लोगों का दिल जीत लिया। पाकिस्तान में उन्हें एक राष्ट्रीय प्रतीक की तरह देखा जाने लगा।
लता मंगेशकर की श्रद्धांजलि
स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने नूरजहाँ के बारे में कहा था: “हर किसी के रोल मॉडल होते हैं और मुझे यह कबूल करने में कोई झिझक नहीं है कि नूरजहां मेरे लिए रोल मॉडल थीं।

हमने बचपन में नूरजहाँ को सुना और उनके सुरों को दिमाग में रखकर बड़े हुए।” लता जी ने आगे कहा: “जो वो गाती थीं उनको सुन सुन के मैंने गाना फिल्मों में कैसे गाना चाहिए वो सीखा।” उन्होंने यह भी बताया कि नूरजहाँ उन्हें अपनी छोटी बहन की तरह मानती थीं और जब भी मिलती थीं तो प्यार से गले लगाती थीं।

दिलीप कुमार का सम्मान
ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार ने नूरजहाँ के व्यक्तित्व की तारीफ करते हुए कहा था: “इस दुनिया के पास सिर्फ एक नूरजहाँ है।” 1983 में जब नूरजहाँ भारत आईं तो दिलीप कुमार ने उनका परिचय कराते हुए कहा था कि 35 साल बाद इस दिलकश और दिल को छू जाने वाली हस्ती से मिलना एक अविस्मरणीय अनुभव है। उन्होंने नूरजहाँ के कलाकार व्यक्तित्व और उनकी संगीत साधना की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
प्रभाव और विरासत
नूरजहाँ की गायकी ने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया। उनकी खास शैली और सुरों की ताकत को बाद की गायिकाओं ने आदर्श बनाया। चाहे फिल्मों के गीत हों या ग़ज़लें – नूरजहां की आवाज़ आज भी रेडियो, टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर गूंजती रहती है। संगीत के इतिहास में उनका स्थान इतना ऊंचा है कि उन्हें बॉलीवुड और लोलिवुड (पाकिस्तानी सिनेमा) दोनों का गौरव कहा जाता है।
99वें जन्मदिन पर स्मरण
नूरजहाँ भले ही 23 दिसंबर 2000 को इस दुनिया से रुख़्सत हो गईं, लेकिन उनकी आवाज़ अमर है। उनका यह 99वां जन्मदिन उनके प्रशंसकों के लिए उस विरासत को याद करने का दिन है, जो उन्होंने सुरों की दुनिया में छोड़ी। नूरजहाँ सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि वे संस्कृति, प्रेम और कला की जीवित मिसाल थीं ।
उनकी विरासत हमें सिखाती है कि संगीत सरहदों से परे होता है और सच्ची कला हमेशा ज़िंदा रहती है।
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