सुरजापुरी समुदाय की अनसुनी आवाज़: राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण की मांग- लेखक: एम. खुशनूद वलायत

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कटिहार ज़िले के कदवा और प्राणपुर विधानसभा क्षेत्र सीमांचल की राजनीति में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। यह इलाका बाढ़, कटाव, पलायन बेरोज़गारी और पिछड़ेपन जैसी गंभीर समस्याओं से लंबे समय से जूझ रहा है। लेकिन इन सबके बीच सबसे अहम तथ्य यह है कि यहाँ की प्रमुख और निर्णायक आबादी सुरजापुरी समुदाय की है, जो दशकों से आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का शिकार है।

पिछले दो विधानसभा चुनावों में एनडीए और महागठबंधन दोनों ने ही स्थानीय सुरजापुरी समाज को दरकिनार करते हुए बाहरी और गैर-सुरजापुरी उम्मीदवारों को टिकट दिया। परिणामस्वरूप स्थानीय समाज की आकांक्षाएँ अधूरी रह गईं और जनता तथा जनप्रतिनिधियों के बीच संवादहीनता बढ़ती चली गई। विजयी नेता चुनाव जीतने के बाद पटना और दिल्ली तक ही सीमित रहे, जबकि क्षेत्र की असली समस्याएँ जस की तस बनी रहीं। आज आवश्यकता इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने की है, ताकि सुरजापुरी समाज को न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल सके बल्कि उन्हें सामाजिक न्याय भी सुनिश्चित हो।

सुरजापुरी समाज की स्थिति आज भी संघर्षों से भरी हुई है। आर्थिक दृष्टि से यह समुदाय खेतिहर मज़दूरी, छोटे व्यापार और मज़दूरी पर निर्भर है। बाढ़ और कटाव हर साल इनकी रोज़ी-रोटी पर चोट पहुँचाते हैं, जिसके चलते युवाओं को पलायन कर पंजाब, दिल्ली, महाराष्ट्र और खाड़ी देशों तक जाना पड़ता है। शैक्षणिक स्थिति भी बेहद चिंताजनक है क्षेत्र में उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों का घोर अभाव है, लड़कियों की शिक्षा विशेष रूप से प्रभावित है और विश्वविद्यालयों व केंद्रीय नौकरियों में इनकी भागीदारी नगण्य है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो स्थिति और भी निराशाजनक है। जनसंख्या में भारी हिस्सेदारी होने के बावजूद सुरजापुरी समाज को प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। पार्टियां के संगठन से लेकर विधानसभा विधान परिषद् और संसद तक टिकट वितरण में लगातार उपेक्षा की गई है। बाहरी नेताओं को थोपने की प्रवृत्ति ने स्थानीय नेतृत्व को दबा दिया है, और परिणामस्वरूप जनता की आवाज़ सत्ता तक नहीं पहुँच पाती।

आज सुरजापुरी समुदाय की मांग केवल राजनीतिक टिकट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकार का प्रश्न है। इस समाज को राज्य की ओबीसी-1 सूची और केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि शिक्षा और नौकरियों में उन्हें समान अवसर मिल सके “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” तभी सार्थक होगा जब सुरजापुरी समाज को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी दी जाएगी, स्थानीय मुद्दों को देखते हुए भी यह प्रतिनिधित्व अत्यंत आवश्यक है। बलिया बेलौन, सालमारी और आबादपुर को प्रखंड का दर्जा दिलाना, रैयापुर घाट, कोटा घाट और दुर्गापुर घाट पर पुल का निर्माण, डिग्री कॉलेज और तकनीकी संस्थानों की स्थापना, बाढ़ और कटाव पीड़ितों के लिए ठोस पुनर्वास नीति बनाना और पलायन रोकने के लिए स्थानीय उद्योग-धंधों का सृजन ये सब ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें केवल स्थानीय सुरजापुरी नेतृत्व ही ईमानदारी से उठा सकता है और समाधान ढूंढ सकता हैं।

इसलिए हम राष्ट्रीय स्तर पर सभी राजनीतिक दलों चाहे एनडीए हों या महागठबंधन से यह अपील करते हैं कि वे अपनी रणनीति में ऐतिहासिक सुधार का प्रयास करें। कदवा और प्राणपुर विधानसभा में स्थानीय सुरजापुरी प्रत्याशी को टिकट दिया जाए, सुरजापुरी समाज को ओबीसी-1 और केंद्रीय सूची में शामिल किया जाए और शिक्षा, नौकरियों व राजनीति में उनकी जनसंख्या के अनुपात से हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए!
यह मांग केवल एक समुदाय की नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र की आत्मा समानता और सामाजिक न्याय की सच्ची पुकार है। जब तक सुरजापुरी समाज को उसका हक और हिस्सा नहीं मिलेगा, तब तक सीमांचल का वास्तविक विकास अधूरा ही रहेगा।

(नोट- लेखक एम. खुशनूद वलायत सुरजापुरी समुदाय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता और इतिहास के छात्र हैं और उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह जरूरी नहीं कि ग्लोबलटुडे इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.)

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