याचिका में कहा गया है कि यूपी और उत्तराखंड सरकारों द्वारा जारी आदेश संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है जिससे समाज के हाशिए पर पड़े वर्ग और मुसलमानों की रोजी-रोटी पर असर पड़ेगा।
उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रा के मार्ग पर दुकानदारों के नाम लिखे जाने का निर्देश दिए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। APCR के साथ ही तृणमूल सांसद महुआ मोईत्रा, सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर अपूर्वानंद और लेखक-पत्रकार आकार पटेल ने इस बाबत एक याचिका दायर की है।
महुआ मोइत्रा की तरफ से दायर याचिका में कहा गया है कि कांवड़ यात्रा के मार्ग में पड़ने वाले दुकानदारों से यात्रियों के खान-पान से जुडी मान्यताओं का सम्मान करने और कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर जारी किया गया यह आदेश सरकारी मनमानी है और लोगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया है कि इस आदेश के बहाने समाज के सबसे कमजोर और हाशिए के वर्ग निशाना बनाया जा रहा है।
दूसरी ओर अपूर्वानंद और आकार पटेल की याचिका में कहा गया है की उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी आदेश संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 17 के तहत अधिकारों को प्रभावित करता है। याचिका के मुताबिक यह मुसलमानों के अधिकारों को भी प्रभावित करता है, जो अनुच्छेद 19 (1)(जी) का उल्लंघन है। इस आदेश से उनकी रोजी रोटी पर प्रभाव पड़ेगा।
इसके साथ ही याचिका में ये भी कहा गया है कि यह आदेश ‘अस्पृश्यता’ की प्रथा का समर्थन करता है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत स्पष्ट रूप से किसी भी रूप में वर्जित है।
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