हम इंसानियत के सबसे पुराने और सबसे बड़े अन्याय को खत्म करने में नाकाम क्यों हो रहे हैं? – शोभा शुक्ला

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“महिला हिंसा, इंसानियत के सबसे पुराने और सबसे बड़े अन्याय में शामिल हैं पर उस पर अंकुश लगाने के लिए प्रयास अत्यंत कम हुए हैं। कोई भी समाज खुद को सही, सुरक्षित या स्वस्थ नहीं कह सकता जब तक उसकी आधी आबादी डर में जी रही हो। इस हिंसा को खत्म करना सिर्फ़ नीति का मामला नहीं है, बल्कि यह सम्मान, बराबरी और मानवाधिकारों का मामला है।” – यह कहना है संयुक्त राष्ट्र की सर्वोच्च स्वास्थ्य संस्था – विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ टेड्रोस अधनोम घेब्रेसस का।

अनेक अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संधियों में सरकारों ने वादा किया है कि महिलाओं का अधिकार है कि वह हिंसा-मुक्त जीवन जियें। जैसे कि 1979 में पारित कानूनी-रूप से बाध्य अंतरराष्ट्रीय संधि सीईडीएडबल्यू (CEDAW) और 1993 का महिला हिंसा समाप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र।

अनेक देशों में महिला हिंसा विरोधी व्यापक क़ानून ही नहीं हैं तो रिपोर्ट कैसे होगी? जहाँ क़ानून हैं, वहाँ भी महिला हिंसा अनेक कारणों से रिपोर्ट कम हो पाती है। महिला हिंसा आंकड़ें इस संदर्भ में देखने चाहिए कि असल स्थिति अधिक गंभीर है।

आंकड़ें बताते हैं कि 2000 से वैश्विक महिला हिंसा दर में कोई विशेष बदलाव नहीं हुआ है: 26 साल से महिला हिंसा दर वहीं का वहीं है तो निश्चित तौर पर यह अत्यंत चिंता का विषय है और अनेक गंभीर सवाल उठाता है। जवाबदेही तो होनी चाहिए क्योंकि सभी सरकारें ‘महिला हिंसा को समाप्त’ करने के वादे तो करती हैं पर आँकड़ें दर्शाते हैं कि 2000 से महिला हिंसा दर में कोई विशेष बदलाव ही नहीं हुआ है।

महिला हिंसा दर में सालाना गिरावट सिर्फ 0.2% है। हर 3 में से 1 महिला हिंसा का शिकार होती है।

194 में से 165 देशों में महिला हिंसा कानून तो हैं पर सिर्फ़ 104 के पास व्यापक विधिक अधिनियम हैं जिससे कि महिला हिंसा पर अंकुश लग सके। जिन देशों में महिला हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून और व्यापक विधिक अधिनियम हैं, वहाँ महिला हिंसा दर लगभग आधा हो गया है (उन देशों की तुलना में जहाँ महिला हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून ही नहीं हैं)।

जिन देशों में महिला हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून और विधिक अधिनियम हैं, उन्होंने पर्याप्त बजट आवंटित नहीं किया है – बिना बजट के क़ानून लागू कैसे होगा, महिला को विधिक सहायता कैसे मिलेगी, आदि? महिला हिंसा पर सरकारी बजट को यदि वैश्विक स्तर पर देखें तो बढ़ने के बजाय यह उल्टे कम हो रहा है – जबकि हिंसा कम होने का नाम ही नहीं ले रही है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कुछ सप्ताह पहले एक नई रिपोर्ट जारी की जिसके अनुसार, एक ओर सरकारें महिला हिंसा को रोकने के लिए पर्याप्त आर्थिक निवेश नहीं कर रही हैं और उल्टे बजट कम कर रही हैं, तो दूसरी ओर मानवीय और प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ोतरी पर हैं, महिलाओं को शारीरिक और मानसिक हिंसा के साथ अब डिजिटल हिंसा भी झेलनी पड़ रही है, और आर्थिक और सामाजिक ग़ैर-बराबरी अनेक देशों में चिंताजनक स्तर पर क़ायम है जिसके कारण करोड़ों महिलाएं और किशोरियों के लिए हिंसा का ख़तरा बढ़ रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर विकास पर जो सरकारें निवेश करती हैं उसमें से 2022 में सिर्फ़ 0.2% महिला हिंसा पर निवेश हुआ – और 2025 में यह राशि और कम हो गई है – जब कि महिला हिंसा का दर कम नहीं हुआ है।

स्वास्थ्य और महिला अधिकार

स्वास्थ्य अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक डॉ त्लालेंग मोफ़ोकेंग ने सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) से कहा कि स्वास्थ्य अधिकार और महिला अधिकार, मौलिक मानवाधिकारों में शामिल है। सरकारों को चाहिए कि यह कथनी और करनी में फ़र्क़ मिटाएँ, स्वास्थ्य और जेंडर पर पर्याप्त निवेश करें और महिला हिंसा का अंत करें। डॉ मोफ़ोकेंग ने कहा कि स्वास्थ्य अधिकार को सतत विकास और मानवाधिकार से अलग-थलग कर के नहीं देखा जा सकता क्योंकि सर्वांगीण विकास के लिए स्वास्थ्य अधिकार अनिवार्य है, जेंडर समानता अनिवार्य है, महिला हिंसा का अंत होना अनिवार्य है – इसमें कोई दो राय हो ही नहीं सकती।

2024 में हर 4 में से 1 देश में महिला अधिकार के ख़िलाफ़ मुहिम पनपी

अन्तर-सरकारी मंच कैरीकॉम गुयाना की सह-महासचिव एलिसन ड्रायटों ने सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) को बताया कि 2024 में हर 4 में से 1 देश में महिला अधिकार के ख़िलाफ़ मुहिम पनपी है। कुछ सरकारों ने महिला अधिकार की ओर हुई थोड़ी बहुत प्रगति को पलट दिया है। जेंडर समानता के प्रयास अब कमजोर हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य अधिकार और महिला अधिकार दोनों, कानूनी रूप से बाध्य अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों में शामिल हैं, सरकारों को इन वादों पर खरा उतरना होगा।

स्वास्थ्य अधिकार कोई औपचारिकता नहीं है बल्कि हर इंसान का मानवाधिकार है जिसको सुनिश्चित करने के लिए सरकारें बाध्य हैं – यह कहना है डॉ हैलेसस गेताहूँ का जिन्होंने 2 दशकों तक विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र के साझा मंचों का वरिष्ठ पदों पर नेतृत्व किया है और अब जेनेवा-स्थित ग्लोबल सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी एंड इंक्लूज़न के निर्देशक के रूप में, विकासशील देशों में सेवा प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि 1966 में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय कोवेनेंट को 174 देशों ने पारित किया था जिसमें स्वास्थ्य अधिकार निहित हैं।

महिला अधिकारों में स्वास्थ्य अधिकार भी शामिल हैं। उदाहरण के तौर पर बिना प्रजनन और यौनिक स्वास्थ्य के कैसे स्वास्थ्य अधिकार की कल्पना की जा सकती है? इसके बावजूद अनेक देशों में सुरक्षित गर्भपात प्रतिबंधित है और मातृत्व और शिशु मृत्यु दर अत्यंत चिंताजनक स्तर पर है, बाल विवाह और कम उम्र में गर्भावस्था आज भी अनेक देशों में व्याप्त है, शिक्षा अधिकार और रोज़गार में बराबरी से भागीदारी भी किशोरियों और महिलाओं के लिए एक चुनौती बनी हुई है।

आयशा अमीन जो बैठक नमक समूह की संस्थापिका हैं, ने बताया कि प्राकृतिक आपदाओं में महिला स्वास्थ्य की स्थिति अधिक बिगड़ जाती है। जैसे कि माहवारी स्वच्छता, प्रजनन और यौनिक स्वास्थ्य सेवाएं, आदि बाढ़ जैसी आपदाओं में प्रभावित हो जाती हैं और इनका मिलना दूभर हो जाता है। आपदाओं में महिला हिंसा भी बढ़ जाती है।

आयशा का मानना है कि जबतक सरकारें महिलाओं को नीति निर्माण और लागू करने में हर स्तर पर शामिल नहीं करेंगी तब तक अपेक्षित महिला अधिकार नतीजे नहीं मिलेंगे।

2015 में दुनिया के सभी सरकारों के अध्यक्षों ने 17 सतत विकास लक्ष्यों को पारित कर के एक बड़ी उम्मीद दी थी क्योंकि उन्होंने यह भी माना था कि यह 17 लक्ष्य आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं – और 2030 तक सतत विकास के लिए सब लक्ष्यों पर खरा उतरना ज़रूरी है। महिला अधिकार के वादे को पूरा करना है (लक्ष्य 5) तो स्वास्थ्य अधिकार (लक्ष्य 3), शिक्षा अधिकार (लक्ष्य 4), आदि पर भी खरा उतरना भी उतना ही आवश्यक है – उसी तरह स्वास्थ्य अधिकार के वादे को पूरा करने के लिए महिला अधिकार, शिक्षा अधिकार और अन्य सतत विकास लक्ष्यों पर भी खरा उतरना होगा।

2030 के सतत विकास के वादे को पूरा करने के लिए अब सिर्फ़ 5 वर्ष शेष रह गए हैं।

(नोट:- उपरोक्त लेख लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। ग्लोबलटुडे इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। लेखक शोभा शुक्ला, नारीवादी कार्यकर्ता हैं, लखनऊ के लोरेटो कॉन्वेंट कॉलेज की सेवा निवृत्त वरिष्ठ शिक्षिका रही हैं और सीएनएस (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस) की संस्थापिका-संपादिका हैं। उन्हें ट्विटर्/एक्स पर पढ़ें @shobha1shukla)

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