बदायूँ/सहसवान: क़लम रुक गई, मगर असर बाकी रहेगा। हर लफ़्ज़ में उनका सफ़र बाकी रहेगा। अदब, इल्म और पत्रकारिता की दुनिया का रोशन सितारा हमेशा के लिए खामोश हो गया। सहसवान के प्रसिद्ध शायर, वरिष्ठ पत्रकार व अधिवक्ता सैयद एस.एन.आर. नक़वी उर्फ़ सिब्तेन अख़गर का लंबी बीमारी के बाद दिल्ली में इंतिक़ाल हो गया। उनके निधन की खबर सुनते ही सहसवान समेत पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई।
उनके पार्थिव शरीर को सहसवान लाया गया, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने नम आंखों से आखिरी दीदार किया। नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद दोपहर 2:30 बजे सहसवान के कोट स्थित कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दिया गया। इस मौके पर अदबी, पत्रकारिता, सामाजिक और वकालत जगत के तमाम लोग मौजूद रहे। हर आंख नम और हर दिल ग़मगीन नज़र आया।
सिब्तेन अख़गर: अदब, तहज़ीब और इंसानियत की मिसाल
सिब्तेन अख़गर साहब केवल एक नाम नहीं, बल्कि सच, इंसाफ़ और मोहब्बत की जीती-जागती मिसाल थे। वरिष्ठ अधिवक्ता होते हुए भी उनके भीतर का शायर हमेशा जिंदा रहा। उनकी शायरी में समाज का दर्द, इंसानियत की खुशबू, मोहब्बत की नरमी और वक़्त की तल्ख़ हक़ीक़त साफ झलकती थी। उनके अल्फ़ाज़ पढ़े नहीं, महसूस किए जाते थे।
उनकी मशहूर किताब ‘लमयाजिल’ ने देश-विदेश के अदबी हलकों में उन्हें खास पहचान दिलाई। उनकी ग़ज़लें और नज़्में आज भी ज़ुबान पर ताज़ा हैं।
पत्रकारिता और वकालत में अमिट छाप
पत्रकारिता में उर्दू दैनिक ‘क़ौमी आवाज़’ के वरिष्ठ पत्रकार के रूप में उन्होंने दबे-कुचले वर्गों की आवाज़ बुलंद की। उनकी बेबाक़ लेखनी समाज को सोचने पर मजबूर कर देती थी। सहसवान में लंबे समय तक अधिवक्ता के रूप में सेवा देते रहे। उनके इंतिकाल पर अधिवक्ताओं ने दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि दी।
चाहने वालों का कहना है कि उनकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकती। अदबी संगठन, पत्रकार, अधिवक्ता और समाजसेवियों ने खिराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए कहा, सिब्तेन अख़गर का जाना उर्दू अदब, पत्रकारिता और समाज के लिए अपूरणीय क्षति है।
कलम रुक गई मगर असर बाकी रहेगा, हर लफ़्ज़ में उनका सफ़र बाकी रहेगा।
वो चले गए तो क्या हुआ दुनिया से, अदब की दुनिया में उनका ज़िक्र बाकी रहेगा।
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