
दिल्ली: पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा पत्रकार शम्स तबरेज कासमी द्वारा साझा किए गए एक वीडियो के खिलाफ ‘तबादला अनुरोध’ (Takedown Request) जारी करने के बाद पत्रकारों, डिजिटल अधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक हस्तियों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। आलोचकों का कहना है कि यह स्वतंत्र मीडिया की आवाज को दबाने के लिए कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग का एक और उदाहरण है।
पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब ने की कड़ी निंदा
इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व राज्यसभा सांसद मोहम्मद अदीब ने बंगाल पुलिस की कार्रवाई को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। उन्होंने एक वीडियो संदेश में कहा, “मुझे अभी-अभी मालूम हुआ है कि मिल्लत टाइम्स के एडिटर-इन-चीफ शम्स तबरेज कासमी के खिलाफ बंगाल में पुलिस द्वारा मामला उठाया गया है। इस हकीकत को कौन छुपाएगा कि वहां क्या हो रहा है? असल में जो हक की आवाज उठाई जा रही है, उसे दबाने की कोशिश की जा रही है।”
उन्होंने आगे कहा कि यह सरकार की गिरावट का स्तर है कि सच दिखाने पर मीडिया को डराने की कोशिश हो रही है। उन्होंने अपील की, “मैं उन तमाम लोगों से अपील करता हूँ कि अगर आपने इस चैनल या शम्स तबरेज के हक में आवाज नहीं उठाई, तो आपके लिए आवाज उठाने वाला अब कोई दूसरा बचेगा नहीं। हम ऐसे बेबाक चैनल को किसी कीमत पर झुकने नहीं देंगे।”
क्या है पूरा मामला?
कोलकाता पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) को एक नोटिस भेजकर शम्स तबरेज कासमी के अकाउंट से पोस्ट किए गए एक वीडियो को हटाने की मांग की है। यह वीडियो पश्चिम बंगाल में हालिया चुनाव परिणामों के बाद हुई कथित हिंसा और अशांति से संबंधित बताया जा रहा है। गौरतलब है कि कासमी से पहले यह वीडियो तृणमूल कांग्रेस की सांसद सागरिका घोष समेत कई अन्य लोगों द्वारा भी साझा किया गया था।
पुलिस का पक्ष और कानूनी धाराएं
पुलिस ने अपने नोटिस में इस वीडियो और उसके साथ की गई टिप्पणी को “भ्रामक” और “उत्तेजक” बताया है। पुलिस का दावा है कि इस सामग्री से सांप्रदायिक तनाव फैल सकता है। इसके लिए आईटी अधिनियम की धारा 79(3)(b) और आईटी नियम 3(1)(d) का हवाला दिया गया है।

पक्षपाती कार्रवाई के आरोप
शम्स तबरेज कासमी ने बताया कि उन्हें इस कार्रवाई की जानकारी ‘X’ की ओर से आए एक ईमेल से मिली। उन्होंने सवाल उठाया कि जब यही वीडियो सागरिका घोष और टीएमसी के अन्य नेताओं ने साझा किया था, तो केवल उन्हें ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है?
‘पत्रकारिता अपराध नहीं है’
सोशल मीडिया पर इस घटना के बाद “Journalism Is Not A Crime” (पत्रकारिता अपराध नहीं है) ट्रेंड कर रहा है। पत्रकारों और फ्री स्पीच एक्टिविस्ट्स का तर्क है कि यदि वीडियो वास्तव में अवैध था, तो कार्रवाई सभी पर समान रूप से होनी चाहिए थी। एक स्वतंत्र पत्रकार को निशाना बनाना प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।
यह विवाद एक बार फिर भारत में स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए सिकुड़ते स्थान और सरकार द्वारा डिजिटल कानूनों के उपयोग पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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