नई दिल्ली | 4 फरवरी, 2026(डॉ. एम अतहर उद्दीन मुन्ने भारती):जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के हालिया फैसले का स्वागत करते हुए इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) की जीत बताया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय उन प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है जो कानून की आड़ में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं।
प्रशासनिक दखलअंदाजी पर प्रहार
मौलाना मदनी ने रेखांकित किया कि पिछले कुछ समय में, विशेषकर उत्तर प्रदेश में, निजी स्थानों पर नमाज या धार्मिक आयोजनों को बेवजह ‘कानून-व्यवस्था’ का मुद्दा बनाया गया। उन्होंने कहा:
- बिना किसी ठोस आधार के एफआईआर दर्ज की गईं और गिरफ्तारियां हुईं।
- धार्मिक इबादत को अपराध की तरह पेश किया गया, जो असंवैधानिक है।
- अदालत का यह फैसला साफ करता है कि प्रशासन अपनी मर्जी से नागरिकों के पूजा-पाठ के अधिकार को नहीं छीन सकता।
आगामी रमजान और कानून का पालन
आने वाले पवित्र महीने रमजान-उल-मुबारक का जिक्र करते हुए मौलाना मदनी ने उम्मीद जताई कि:
- तरावीह और अन्य इबादतों में उत्तर प्रदेश पुलिस पिछले साल की तरह कोई बाधा उत्पन्न नहीं करेगी।
- पुलिस और प्रशासन अपनी कार्यशैली में संवैधानिक गरिमा का ध्यान रखेंगे।
- उन्होंने स्थानीय जिम्मेदार लोगों को सलाह दी कि वे कोर्ट के इस फैसले की प्रति (Copy) अपने पास सुरक्षित रखें, ताकि किसी भी गैर-संवैधानिक कार्रवाई का कानूनी जवाब दिया जा सके।
“जमीअत उलमा-ए-हिंद हमेशा शांति और सामाजिक सौहार्द की पक्षधर रही है, लेकिन संवैधानिक अधिकारों पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यदि भविष्य में भी इबादत पर रोक लगाने की कोशिश हुई, तो हम कानूनी रास्ता अपनाने में जरा भी नहीं हिचकिचाएंगे।”
— मौलाना महमूद असद मदनी
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