ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने जिन्ना का पाकिस्तान जाने का प्रस्ताव ठुकराकर भारत के लिए लड़ना चुना। उनकी शहादत और जामिया स्थित कब्र आज भी प्रेरणा देती है।
आज 3 जुलाई है। भारत के सैन्य इतिहास का एक ऐसा पन्ना, जो वीरता, देशभक्ति और सर्वोच्च बलिदान की स्याही से लिखा गया है। आज ही के दिन, 3 जुलाई 1948 को भारत माता के वीर सपूत और 1947-48 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के महानायक ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान (Brigadier Mohammad Usman) ने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
महज 36 साल की उम्र में देश के लिए शहीद होने वाले इस जांबाज को दुनिया “नौशेरा का शेर” (Lion of Naushera) के नाम से जानती है। उनकी शहादत के इस विशेष अवसर पर, आइए जानते हैं उस महान योद्धा की कहानी जिसने पाकिस्तान के ‘सेना प्रमुख’ बनने के ऑफर को लात मार दी और वतन के लिए मर मिटना चुना।
जब जिन्ना के ‘सेना प्रमुख’ बनने के प्रस्ताव को लात मार दी
1947 में जब भारत का विभाजन हुआ, तो सेना का भी बंटवारा हुआ। ब्रिगेडियर उस्मान उस समय ‘बलुच रेजिमेंट’ में थे, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के हिस्से में चली गई थी।
पाकिस्तान के कायदे-आजम मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान ब्रिगेडियर उस्मान की सैन्य कुशलता से अच्छी तरह वाकिफ थे। उन्होंने उस्मान को पाकिस्तान आने का न्यौता दिया और लालच दिया कि पाकिस्तान आते ही उन्हें पाकिस्तानी सेना का पहला मुस्लिम चीफ (Army Chief) बना दिया जाएगा।
लेकिन एक सच्चे देशभक्त की तरह ब्रिगेडियर उस्मान ने इस बड़े प्रलोभन को ठुकरा दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह एक धर्मनिरपेक्ष भारत के सिपाही हैं और अपनी आखिरी सांस तक इसी मिट्टी की सेवा करेंगे। इसके बाद उनका ट्रांसफर भारतीय सेना की डोगरा रेजिमेंट में कर दिया गया।
कसम: “जब तक जमीन वापस नहीं जीत लेता, चटाई पर सोऊंगा”
विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तानी सेना ने कबाइलियों के भेष में जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया। इस संकट की घड़ी में ब्रिगेडियर उस्मान को 50 पैरा ब्रिगेड की कमान सौंपी गई और उन्हें नौशेरा सेक्टर को बचाने का जिम्मा मिला।
शुरुआती दिनों में भारी गोलाबारी के कारण रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ‘झंगड़’ इलाका भारत के हाथ से निकल गया। ब्रिगेडियर उस्मान ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार माना। उन्होंने एक कड़े सैनिक की तरह कसम खाई:
“जब तक मैं झंगड़ को दोबारा जीतकर पाकिस्तान के चंगुल से आजाद नहीं करा लेता, तब तक मैं पलंग पर नहीं सोऊंगा, सिर्फ जमीन पर चटाई बिछाकर सोऊंगा।”
नौशेरा की ऐतिहासिक जंग और पाकिस्तान का खौफ
फरवरी 1948 में, पाकिस्तानी सैनिकों ने नौशेरा पर कब्जा करने के लिए लगभग 11,000 सैनिकों के साथ बड़ा हमला बोल दिया। ब्रिगेडियर उस्मान के पास महज 1,000 से 1,500 जवान थे।
संख्या में बेहद कम होने के बावजूद उस्मान की रणनीतिक सूझबूझ और अदम्य साहस के आगे पाकिस्तानी सेना टिक नहीं सकी। इस युद्ध में लगभग 2,000 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए, जबकि भारत के केवल 33 जवान शहीद हुए। इस ऐतिहासिक और चमत्कारी जीत के बाद उन्हें “नौशेरा का शेर” का खिताब मिला। इसके तुरंत बाद, मार्च 1948 में उन्होंने अपनी कसम पूरी की और झंगड़ पर दोबारा तिरंगा लहरा दिया।
पाकिस्तानी सेना उनके नाम से इस कदर बौखला गई थी कि उन्होंने ब्रिगेडियर उस्मान के सिर पर 50,000 रुपये का इनाम घोषित कर दिया था।
3 जुलाई 1948: वो आखिरी शाम और अमर बलिदान
3 जुलाई 1948 की शाम को करीब 5:45 बजे, ब्रिगेडियर उस्मान झंगड़ में अपनी डिफेंस पोजिशन की समीक्षा कर रहे थे। तभी पाकिस्तान की ओर से भारी आर्टिलरी (तोपखाने) से गोलाबारी शुरू हो गई। उस्मान हमेशा की तरह निडर होकर अपने जवानों को सुरक्षित बंकरों में जाने का निर्देश दे रहे थे।
इसी दौरान एक 25-पाउंडर तोप का गोला उनके बिल्कुल करीब आकर फटा। इस भीषण धमाके ने भारत के इस महान नायक को हमसे छीन लिया। दम तोड़ने से पहले उनके आखिरी शब्द थे:
“मैं तो जा रहा हूँ, लेकिन दुश्मन के कदम अब आगे नहीं बढ़ने चाहिए। ज़मीन का एक इंच टुकड़ा भी उनके पास नहीं जाना चाहिए।”
जब रो पड़ा था पूरा देश: नेहरू और पटेल ने दिया था कंधा
ब्रिगेडियर उस्मान भारत के सैन्य इतिहास में युद्ध के मैदान में शहीद होने वाले सबसे वरिष्ठ सैन्य अधिकारी थे। उनकी शहादत की खबर से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई।
जब उनका पार्थिव शरीर दिल्ली लाया गया, तो देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और रक्षा मंत्री बलदेव सिंह खुद उनके जनाजे में शामिल हुए। यह भारतीय इतिहास के उन दुर्लभ पलों में से था जब देश का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व किसी सैनिक के जनाजे को कंधा दे रहा था। उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया परिसर में सुपुर्द-ए-खाक किया गया।

देश के प्रति उनकी इस अद्वितीय वफादारी और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के दूसरे सबसे बड़े वीरता पुरस्कार ‘महावीर चक्र’ (Maha Vir Chakra) से सम्मानित किया गया।
राष्ट्रवाद की अमर प्रेरणा
ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान केवल एक कुशल सैन्य कमांडर नहीं थे, बल्कि वह भारत की धर्मनिरपेक्षता और अखंडता के सबसे बड़े प्रतीक थे। उन्होंने धर्म के आधार पर ऊंचे पद को चुनने के बजाय, अपने वतन की मिट्टी के लिए ‘सैनिक’ बनकर शहीद होना बेहतर समझा।
आज 3 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि पर, कृतज्ञ राष्ट्र “नौशेरा के शेर” ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान के चरणों में शत-शत नमन करता है। उनका जीवन और उनका बलिदान हर भारतीय के दिलों में हमेशा जिंदा रहेगा। जय हिंद!
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