प्रकृति के कुछ नियम हैं जिन्हे त्याग कर संसार में जीवित रहना मुमकिन नहीं है। उन्हीं नियम में से एक है खाद्य श्रृंखला यानी फूड चैन।
संसार में कुछ जीव शाकाहारी हैं, कुछ माँसाहारी, कुछ सर्वहारी।
अल्लाह ,ईश्वर, प्रकृति जो भी आप कहें उसका नियम एवं प्रबंधन देखये कि जीव के दांतों के आकार उस के भोजन की आदत के अनुसार ही होता हैं. जिन जीवों के दांत कीलाकार हैं वो मांस खाते हैँ और जिनके चपटाकार हैं वह शाकाहारी हैँ। मनुष्य इनमें एक ऐसा जीव हैं जो सर्वभक्षी है यानी इसके दाँतों की बनावट कीलाकर भी है और चपटाकार भी।
दूसरी ओर, खाद्य प्रबंध में विचार करने योग्य बात ये है कि अगर विश्व के 800 करोड़ लोग आपके अनुसार शाकाहारी हों जाएं तो इस फूड चैन और खाद्य उपलब्धता पर उसका क्या असर पड़ेगा?
आज विश्व की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी माँसाहारी है। अगर यह बड़ी आबादी मांस छोड़ देती है तो इसका सीधा असर दुनिया भर में सब्जियां, दालों आदि की मांग पर पड़ेगा और इनके दाम आसमान पर पहुंच जाएँगे।

दुनिया भर के सभी उत्पादक क्षेत्र लोगोँ की खाद्य आपूर्ति नहीं कर पाएंगें। दूसरी ओर, चरने वाले पशुओं की आबादी इतनी अधिक हो जाएगी की ये पशु इंसानों का कम पड़ता हुआ खाना भी चट कर जाएंगे। जीवित रहने के लिए, अपना भोजन बचाने के लिए, मनुष्य जानवरों को गोला बारूद से खत्म करना शुरू कर देगा।
हजारों साल से हम सभी कै पूर्वज मांसाहारी थे, शिकार पर निर्भर थे आज कुछ लोग कहते हैं कि मांस नही खाना चाहिए। अगर इश्वर अल्लाह का विवाद छोड़ दिया जाए तो प्रकृति के नियमानुसार मांस का उपभोग संसार में संतुलित पारिस्थितिक तंत्र के लिए अति आवश्यक है। हर किसी के भोजन का सम्मान करें, मांस खाने वाले शाकाहारियों का और शाकाहारहारी मांसाहारीयों का, क्योंकि भोजन प्रकृति की देन है।
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