न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने 2006 के मुंबई ट्रेन बम विस्फोट मामले के सभी आरोपियों को नोटिस जारी किया और राज्य सरकार की अपील पर उनसे जवाब मांगा।
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme COurt) ने गुरुवार को बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें 2006 में मुंबई उपनगरीय रेल नेटवर्क पर हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों के सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था।
यह फैसला तब आया जब महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले से महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (मकोका) के तहत आने वाले अन्य मामलों की सुनवाई प्रभावित हो सकती है।
बरी किए गए लोगों को कड़े मकोका कानून के तहत रखा गया था और उन्होंने लगभग 19 साल जेल में बिताए। मेहता ने कहा, “मुझे लिबर्टी के मामले की जानकारी है। मैं आपसे उनकी रिहाई पर रोक लगाने का आग्रह नहीं कर रहा हूँ। हम चाहते हैं कि फैसले पर रोक लगाई जाए क्योंकि उच्च न्यायालय के कुछ निष्कर्ष ऐसे हैं जो लंबित मकोका के अन्य मुकदमों को प्रभावित कर सकते हैं।”
अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले को अन्य मामलों में मिसाल नहीं माना जाएगा। अपने आदेश में अदालत ने कहा, “हम यह मानने के लिए तैयार हैं कि विवादित फैसले को मिसाल नहीं माना जाएगा, इसलिए विवादित फैसले पर रोक रहेगी।”
यह रोक न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एससी चांडक की उच्च न्यायालय की पीठ द्वारा 2015 में दोषी ठहराए गए 12 मुस्लिम व्यक्तियों पर लगे आरोपों को खारिज करने के कुछ दिनों बाद आई है। पीठ ने अपने 671 पृष्ठों के फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसे सबूत पेश करने में विफल रहा जिससे आरोपियों की संलिप्तता का पता चलता हो। अदालत ने गवाहों की विश्वसनीयता और पहचान की प्रक्रिया में प्रक्रियागत खामियों पर भी आपत्ति जताई।
हालाँकि, शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि फैसले पर रोक का मतलब यह नहीं है कि 12 पुरुषों को वापस जेल भेज दिया जाए। कई कार्यकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय के इस कदम की आलोचना की है।
इस बीच, झूठे आरोप में फंसाए गए एक व्यक्ति, जिसे 2015 में बरी कर दिया गया था, ने एसआईटी द्वारा पुनः जांच की मांग की है।
AIMIM चीफ़ असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया ऐक्स (X ) पर लिखा,” सुप्रीम कोर्ट ने 2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट में बरी किए गए आरोपियों पर हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाई। सरकार ने जल्दीबाज़ी में अपील की, पर मक्का मस्जिद और अजमेर ब्लास्ट में नहीं की। अगर मालेगांव केस में भी बरी हो जाएं तो अपील करेगी? यही असली पैमाना है।”
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