शोले का रामगढ़ और आज का हिंदुस्तान

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जब एक दोस्त ने अचानक फ़ोन कर कहा कि “शोले के पचास साल पूरे हो रहे हैं, इस पर कुछ लिखो”—तो मैं कुछ पल चुप रह गया। क्या लिखा जाए उस फ़िल्म पर, जिस पर पहले ही अनगिनत समीक्षाएँ और किताबें लिखी जा चुकी हैं? पर भीतर कहीं एक हलचल सी हुई। यादों के दरवाज़े धीरे-धीरे खुलने लगे।

मुझे 90 का वह दशक याद आया जब मैं जामिया मिल्लिया इस्लामिया के मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर में पढ़ता था। कोर्स तो मास कम्युनिकेशन का था, मगर हर छात्र की आँखों में सिर्फ़ एक ही सपना चमकता था—फिल्ममेकर बनने का। उस दौर में हमारी बातचीत का ज़िक्र ज़रा सोचिए—कैंटीन में, हॉस्टल की सीढ़ियों पर, लाइब्रेरी के बाहर—हर जगह बस सिनेमा। और वह भी सामान्य हिंदी सिनेमा नहीं, बल्कि दुनिया का सिनेमा। टारकोव्स्की की सोलारिस, कुरोसावा की सेवन समुराई, बुनुएल की विरिडियाना, स्पीलबर्ग की जॉज़। भारतीय फ़िल्मों में भी हम सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक की चर्चा करते। तीसरी धारा का सिनेमा तब हमारे लिए किसी मिशन जैसा था।

लेकिन कभी-कभार चर्चा लौटकर हिंदी फिल्मों पर भी ठहर जाती। तब गुरुदत्त की प्यासा का ज़िक्र होता, के. आसिफ की मुग़ल-ए-आज़म पर बातें होतीं, और फिर कोई अचानक शोले का नाम ले लेता। उस समय हमारे लिए शोले बस तकनीकी रूप से बेजोड़ फिल्म थी। वाइडस्क्रीन सिनेमास्कोप, डॉल्बी साउंड का जादू, विदेशी टेक्नीशियनों की कुशलता, पटकथा का करिश्मा, और वे संवाद जो ज़बान-ज़द-ए-आम हो चुके थे। कभी-कभी कोई थोड़ा सामाजिक रूप से सजग छात्र जया भादुरी के किरदार पर बात छेड़ देता, क्योंकि उस किरदार के ज़रिये विधवा विवाह का मुद्दा उठाया गया था। मगर जिन्होंने कमाल अमरोही की’ दायरा’ जैसी फ़िल्में देख रखी थीं, उनके लिए यह कोई नया विमर्श नहीं था।

लेकिन अब, जब शोले अपने पचास साल पूरे कर चुकी है, तो मुझे लगता है कि उस वक़्त हम बहुत सतही तौर पर उसे देख रहे थे। आज जब उसकी ओर लौटता हूँ, तो वह फिल्म मुझे केवल एक्शन, डायलॉग्स और तकनीक से कहीं अधिक गहरी और अर्थपूर्ण लगती है। उसमें मैं एक पूरे भारत की आत्मा को धड़कते हुए महसूस करता हूँ—एक धर्मनिरपेक्ष भारत की आत्मा।

रामगढ़ गाँव हिंदुस्तान का एक प्रतीक

शोले का रामगढ़ गाँव दरअसल हिंदुस्तान का ही एक प्रतीक है। एक ऐसा गाँव, जहाँ मंदिर और मस्जिद साथ-साथ खड़े हैं। जहाँ ठाकुर बलदेव सिंह और मौलवी साहब दोनों को बराबर का सम्मान मिलता है। जय और वीरू की दोस्ती यह साबित करती है कि रिश्ते की असली बुनियाद धर्म या जाति नहीं होती, बल्कि भरोसा और इंसानियत होती है। यह दोस्ती, यह साझा जीवन, यही तो उस दौर की गंगा-जमुनी तहज़ीब का असली रूप था।

गब्बर सिंह का आतंक इस बात का सबूत है कि अन्याय और ज़ुल्म किसी एक धर्म या जाति को नहीं सताता, बल्कि पूरे समाज को चोट पहुँचाता है। और जब पूरा गाँव मिलकर उसके ख़िलाफ़ खड़ा होता है, तो यह सिर्फ़ ठाकुर की व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं रह जाती, बल्कि अन्याय के ख़िलाफ़ सामूहिक लड़ाई बन जाती है। यही सामूहिकता, यही साझापन भारत की सबसे बड़ी ताक़त रहा है।

बसंती और राधा को अक्सर लोग गौण पात्र समझते हैं, लेकिन अगर गौर से देखा जाए तो यह दोनों स्त्रियाँ कहानी की आत्मा हैं। बसंती अपने चंचल स्वभाव में भी स्त्री की गरिमा और आत्मसम्मान की मिसाल पेश करती है। उसका हर संवाद, हर चुटकी उसकी जीवंतता और साहस की कहानी कहता है। दूसरी ओर राधा है—मौन, शांत, मगर भीतर से बेहद मजबूत। उसका मौन ही सबसे बड़ा प्रतिरोध है। वह समाज को यह दिखाती है कि दुख और धैर्य भी किसी शस्त्र से कम नहीं होते।

भारत की असली पहचान

फिल्म का सबसे भावुक क्षण तब आता है जब गब्बर, मौलवी साहब के बेटे अहमद को मार देता है। उस पल रामगढ़ शोक में डूब जाता है। वहाँ किसी ने यह नहीं कहा कि यह “मुसलमान का बेटा” था। वह पूरे गाँव का बेटा था, और उसकी मौत सबके दिल में एक साथ टीस बनकर चुभी थी। यही तो भारत की असली पहचान है—दर्द भी साझा और जश्न भी साझा।

लेकिन सोचिए, आज के भारत में अगर कोई “अहमद” भीड़ की हिंसा में मारा जाता है, तो क्या पूरा गाँव रोता है? नहीं, आज लोग तालियाँ बजाते हैं, सोशल मीडिया पर जश्न मनाते हैं। यही हमारी सबसे बड़ी त्रासदी है। वही शोले, जिसने हमें सामूहिक दुःख और साझा लड़ाई का सबक दिया था, आज हमें आईना दिखाती है कि हम कितनी दूर भटक गए हैं।

समाज को बांटतीं नयी फिल्म

1975 का भारत आपातकाल की गिरफ्त में था। लेकिन तब भी यह फिल्म उम्मीद देती थी कि ज़ुल्म और आतंक का सामना किया जा सकता है—बशर्ते लोग मिलकर खड़े हों। पचास साल बाद, 2025 का भारत फिल्मों के नए दौर से गुजर रहा है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि आज की कई फिल्में समाज को जोड़ने के बजाय बाँटने में लगी हैं। कश्मीर फ़ाइल्स, केरल फ़ाइल्स, छावा जैसी फिल्में एक पूरे समुदाय को संदेह और नफ़रत की नज़र से दिखाती हैं। और इस सबके बीच शोले हमें याद दिलाती है कि सिनेमा का असली मक़सद समाज को जोड़ना होता है, तोड़ना नहीं।

आज भारत को फिर से रामगढ़ बनने की ज़रूरत है। हमें फिर से ऐसे गाँव चाहिए, जहाँ मंदिर और मस्जिद साथ खड़े हों। हमें फिर से जय और वीरू जैसी दोस्ती चाहिए, जो मज़हब से ऊपर उठकर इंसानियत को गले लगाए। हमें फिर से मौलवी साहब जैसे किरदार चाहिए, जो अपने बेटे की शहादत पर यह कह सके—“अगर मेरा दूसरा बेटा होता, तो मैं उसे भी वतन पर क़ुर्बान कर देता।”

आज भी भारत में हज़ारों इमाम ऐसे हैं जिनके बेटे सीमा पर शहीद होते हैं। लेकिन बदले में उन्हें अपमान और शक की निगाह मिलती है। यही सबसे बड़ा फ़र्क़ है उस दौर और आज के दौर में। शोले हमें बताती है कि क़ुर्बानी का कोई धर्म नहीं होता, शहादत का कोई मज़हब नहीं होता।

शोले-धर्मनिरपेक्ष भारत का घोषणापत्र

शोले सिर्फ़ एक फिल्म नहीं है, यह दरअसल धर्मनिरपेक्ष भारत का घोषणापत्र है। यह फिल्म हमें सिखाती है कि दोस्ती का कोई धर्म नहीं होता, अन्याय से लड़ाई साझा होती है, और विविधता ही हमारी ताक़त है।

आज, पचास साल बाद, जब नफ़रत की आँधियाँ समाज को चीर रही हैं, शोले की गूंज हमें पुकार रही है—“भारत को फिर से सेकुलर बनाओ।”

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