रामपुर: रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे भीषण युद्ध की आंच अब उत्तर प्रदेश के रामपुर तक पहुँच गई है। युद्ध के मैदान में जान गंवाने वाले तहसील स्वार के मसवासी क्षेत्र के युवक शावेद का शव शनिवार को जब उसके पैतृक गांव पहुँचा, तो पूरे इलाके में मातम पसर गया। गमगीन माहौल और हजारों नम आंखों के बीच युवक को सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
वेटर की नौकरी के लिए गया था रूस, किस्मत ले गई मोर्चे पर
मसवासी थाना क्षेत्र के गांव सीतारामपुर (मजरा फतेहगंज) निवासी दूल्हा हसन का 22 वर्षीय पुत्र शावेद करीब 10 माह पहले सुनहरे भविष्य के सपने लेकर रूस गया था। शावेद को वहां एक होटल में वेटर की नौकरी करनी थी, जिसके लिए वह पर्यटक वीजा पर गया था।
परिजनों के अनुसार, रूस पहुँचने के कुछ समय बाद वह वहां की सेना में शामिल हो गया। युद्ध के दौरान उसे फ्रंट लाइन पर तैनात किया गया था। बताया जा रहा है कि एक मिशन के दौरान शावेद को गोली लग गई, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। गुरुवार देर शाम जब मौत की खबर गांव पहुँची, तो कोहराम मच गया।
एयरपोर्ट से गांव तक सिसकियों का शोर
शावेद की मौत की आधिकारिक सूचना मिलने के बाद परिजन गुरुवार रात ही दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे। शनिवार तड़के उसका पार्थिव शरीर दिल्ली एयरपोर्ट पहुँचा, जहाँ से एम्बुलेंस के जरिए शव को गांव लाया गया। दोपहर में जैसे ही शव घर की दहलीज पर पहुँचा, परिजनों की चीख-पुकार से माहौल और भी ज्यादा गमगीन हो गया। अंतिम दर्शन के लिए आसपास के दर्जनों गांवों से भारी भीड़ उमड़ पड़ी।
बुझ गया घर का इकलौता चिराग
शावेद के कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी। वह अपने माता-पिता का मुख्य सहारा था, क्योंकि उसका दूसरा भाई मानसिक रूप से अस्वस्थ है। ग्रामीणों ने बताया कि:
“शावेद बहुत ही मिलनसार और मेहनती लड़का था। उसने अपने परिवार की गरीबी दूर करने और भाई के इलाज के लिए विदेश का रुख किया था, लेकिन किसे पता था कि वह तिरंगे के बजाय कफन में लिपटे हुए वापस आएगा।”
हॉस्टल से आर्मी तक का सफर बना जानलेवा
चर्चा है कि शावेद रूस में एक हॉस्टल में रह रहा था, जहाँ से उसे रूसी सेना के लोग अपने साथ ले गए। इसके बाद वह सेना का हिस्सा बना। हालांकि, किन परिस्थितियों में उसने सेना जॉइन की, इसे लेकर कई सवाल हैं, लेकिन इस फैसले ने परिवार का इकलौता सहारा छीन लिया। शनिवार को गांव के ही कब्रिस्तान में उसे सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया।
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