पटना/नई दिल्ली: बक्सर से लोकसभा सांसद और बिहार के पूर्व कृषि मंत्री सुधाकर सिंह ने बिहार सरकार और बिल गेट्स फाउंडेशन के बीच के संबंधों को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। एक प्रेस नोट जारी कर उन्होंने राज्य की स्वास्थ्य, कृषि और पोषण नीतियों में विदेशी संस्थाओं के “अनुचित हस्तक्षेप” पर गंभीर सवाल उठाए हैं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मांग की है कि गेट्स फाउंडेशन के साथ किए गए सभी ‘MoUs’ को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए।

‘समानांतर प्रशासन’ चलाने का आरोप
सुधाकर सिंह ने अपने मंत्री काल (2022) के अनुभवों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि बिहार के कृषि और स्वास्थ्य विभाग में ‘प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग यूनिट’ (PMU) के नाम पर गेट्स फाउंडेशन के लोग एक “समानांतर प्रशासन” चला रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि:
- विभागीय फाइलों पर अधिकारियों से ज्यादा इन बाहरी सलाहकारों का नियंत्रण रहता है।
- ये सलाहकार सरकारी फाइलों और गोपनीय आंकड़ों तक सीधी पहुंच रखते हैं, जो ‘राजकीय गोपनीयता अधिनियम’ (Official Secrets Act) का उल्लंघन है।
- मंत्रियों को ब्रीफिंग दिए बिना ही कई महत्वपूर्ण तकनीकी और नीतिगत फैसले ले लिए जाते हैं।
HPV वैक्सीन ट्रायल और संसदीय समिति की रिपोर्ट का हवाला
सांसद ने अगस्त 2013 की राज्यसभा की स्वास्थ्य संबंधी स्थाई समिति की 72वीं रिपोर्ट का जिक्र करते हुए गेट्स फाउंडेशन द्वारा फंडेड संस्था ‘PATH’ पर गंभीर आरोप लगाए।
- रिपोर्ट के अनुसार, आंध्र प्रदेश और गुजरात में एचपीवी (HPV) वैक्सीन के परीक्षण के दौरान कई किशोरियों की मृत्यु हुई और नियमों की अनदेखी की गई।
- संसदीय समिति ने इसे एक “सुनियोजित वैश्विक षड्यंत्र” की ओर इशारा माना था।
- सुधाकर सिंह का कहना है कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद बिहार सरकार ने 2014 और फिर 2017 में गेट्स फाउंडेशन के साथ समझौतों को रिन्यू किया, जो राज्य की बेटियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
एपस्टीन फाइलों से जुड़े नाम पर जताई चिंता
सांसद ने वैश्विक मीडिया में चर्चित ‘एपस्टीन फाइलों’ का जिक्र करते हुए कहा कि बिल गेट्स का नाम ऐसे विवादों में आना उनके संदेह को पुख्ता करता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विदेशी संस्थाएं भारत जैसे विकासशील देशों के नागरिकों को “गिनी-पिग” (प्रयोग का सामान) समझती हैं।
सांसद की प्रमुख मांगें:
- MoUs का रद्दीकरण: स्वास्थ्य, कृषि और महिला सशक्तिकरण के नाम पर गेट्स फाउंडेशन के साथ हुए सभी समझौतों को तुरंत खत्म किया जाए।
- बाहरी सहायकों की विदाई: सचिवालय और आईएएस अधिकारियों के कार्यालयों में तैनात विदेशी संस्था के प्रतिनिधियों को हटाया जाए।
- वित्तीय और डेटा ऑडिट: पिछले वर्षों में एकत्र किए गए डेटा के उपयोग की उच्च स्तरीय जांच हो।
- स्वतंत्र नीति निर्माण: बिहार अपनी नीतियां खुद बनाए, न कि किसी विवादित विदेशी निजी संस्था के “दान” पर निर्भर रहे।
“बिहार का गौरव और हमारी बेटियों की गरिमा किसी भी विदेशी फंड से कहीं ऊपर है। हम राज्य की नीतियों को एक संस्था के रहम-ओ-करम पर नहीं छोड़ सकते।” – सुधाकर सिंह, सांसद
सांसद ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार इन बाहरी जंजीरों से प्रशासनिक मशीनरी को मुक्त नहीं करती है, तो यह माना जाएगा कि सरकार जानबूझकर राज्य की संप्रभुता को गिरवी रख रही है।
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