उत्तराखंड में बढ़ती नफरत की राजनीति और विस्थापन पर विशेषज्ञों ने जताई चिंता; APCR ने जारी की रिपोर्ट

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नई दिल्ली, 21 जनवरी 2026: एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) ने बुधवार को नई दिल्ली में “हिंसा और विस्थापन: उत्तराखंड और नफरत की राजनीति” विषय पर एक रिपोर्ट जारी की। इस दौरान आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कानूनी विशेषज्ञों, पत्रकारों, पूर्व नौकरशाहों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने उत्तराखंड में मुस्लिम समुदायों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, विस्थापन और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर गहरा दुख व्यक्त किया।

संवैधानिक मूल्यों का क्षरण और डर का माहौल

कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि उत्तराखंड में नफरत की राजनीति के कारण संवैधानिक सुरक्षा उपायों का लगातार क्षरण हो रहा है। पूर्व नौकरशाह नजीब जंग ने राज्य में हो रहे हमलों और तोड़फोड़ पर सवाल उठाते हुए पूछा, “क्या यह कानून-व्यवस्था का मामला है या जातीय सफाया (ethnic cleansing)?” उन्होंने युवाओं से सरकार और पुलिस को जवाबदेह ठहराने का आह्वान किया।

मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने कहा कि उत्तराखंड में शासन “गहरी असंवैधानिक” दिशा में बढ़ रहा है, जहां ‘देवभूमि’ के नाम पर गैर-हिंदुओं को अवांछित महसूस कराया जा रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि यह हिंसा राजनीतिक संगठनों द्वारा राज्य मशीनरी, मीडिया और जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के माध्यम से आयोजित की जा रही है। उन्होंने नफरत का मुकाबला करने के लिए “स्वयंसेवक सत्य सेना” (volunteer truth army) बनाने का सुझाव दिया।

जमीनी हकीकत: पलायन और पहचान का संकट

प्रेस कॉन्फ्रेंस में साझा किए गए कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • इतिहास और योगदान: लताफत हुसैन ने याद दिलाया कि उत्तराखंड राज्य का गठन हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदायों के साझा बलिदान से हुआ था।
  • व्यापारियों का पलायन: पत्रकार कौशिक राज ने बताया कि दिसंबर 2021 के धर्म संसद के बाद से एक स्पष्ट पैटर्न उभरा है, जिसमें मुस्लिम दुकानदारों को रातों-रात भागने पर मजबूर किया जा रहा है।
  • पहचान छिपाने की मजबूरी: पत्रकार सबा नकवी ने रेखांकित किया कि आज कई लोग सुरक्षित रूप से काम करने या पढ़ने के लिए अपनी पहचान छिपाने को मजबूर हैं।
  • राज्य की प्राथमिकताएं: स्थानीय निवासी शादाब आलम ने कहा कि सरकार बेरोजगारी और विकास जैसे मुद्दों को सुलझाने के बजाय धार्मिक ध्रुवीकरण पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

एकजुटता का आह्वान

पूर्व मंत्री याकूब सिद्दीकी ने अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को साझा करते हुए कहा कि “इंसानियत को जिंदा रखने की जंग लड़नी पड़ेगी।” रिपोर्ट में दस्तावेजीकरण किया गया है कि कैसे राज्य में संवैधानिक सुरक्षा की अनदेखी कर डर और धमकी को सामान्य बना दिया गया है।

सम्मेलन का समापन भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत समानता, गरिमा और अधिकार की रक्षा के सामूहिक आह्वान के साथ हुआ।

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