मौलाना अबुल कलाम आज़ाद बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे, जो एक महान विद्वान, स्वतंत्रता सेनानी, कवि, पत्रकार और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे। उन्होंने भारत की धर्मनिरपेक्ष नींव को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया।
व्यक्तित्व और सादगी
मौलाना आजाद का व्यक्तित्व अद्भुत था – नूरानी आंखें जो इल्म से भरपूर थीं, बरकत वाला चेहरा, और शेरवानी में लिपटा एक ऐसा अंदाज़ जो पूरी तरह हिंदुस्तानी था । उनकी सादगी और विशिष्टता पर न्योछावर लोग उन्हें ‘आजाद’ तख़ल्लुस से जानते थे, जिसने लड़कपन में ही कई अखबारों के संपादक बनकर उर्दू पत्रकारिता में नया इतिहास रचा।
अल-हिलाल: क्रांति का सूरज
1912 में मौलाना आजाद ने उर्दू साप्ताहिक ‘अल-हिलाल’ (The Crescent) की स्थापना की, जो ब्रिटिश राज के खिलाफ एक शक्तिशाली हथियार बन गया । यह केवल एक अखबार नहीं, बल्कि एक पैगाम था जो बेनज़ीरों और बेदिलों को जगाने के लिए था। अल-हिलाल की चरम प्रसार संख्या 25,000 से अधिक थी, जो उस समय उर्दू पत्रकारिता के लिए एक रिकॉर्ड था। इस अखबार ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया और मुस्लिम लीग की आलोचना की, जिसे आजाद ने “लोगों के साथ विश्वासघात” कहा था।
स्वतंत्रता संग्राम के सेनापति
अंग्रेजों ने जब भी मौलाना आजाद को जंजीरों में बांधने का प्रयास किया, उन्होंने अपनी कलम को तलवार बना दिया। 1914 में प्रेस एक्ट के तहत अल-हिलाल को बंद कर दिया गया, फिर उन्होंने ‘अल-बलाग’ की शुरुआत की। 1923 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्षों में से एक बने और महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी रहे। जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘द डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ (1944) में लिखा कि अबुल कलाम आजाद ने अल-हिलाल के माध्यम से भारतीय मुसलमानों से नई भाषा में बात की – न केवल विचार और दृष्टिकोण में नई, बल्कि इसकी बनावट भी अलग थी।
शिक्षा का रोशन भविष्य
1947 में भारत की आजादी के बाद, मौलाना आजाद स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने और 1958 तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल में भारतीय शिक्षा व्यवस्था की नींव रखी गई – विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs), भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बैंगलोर, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE), साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत अकादमी की स्थापना उनकी ही देन है। उन्होंने सभी के लिए प्राथमिक शिक्षा, वयस्क साक्षरता, और तकनीकी प्रशिक्षण पर जोर दिया।
अमर विरासत
मौलाना आजाद ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अथक प्रयास किया और विभाजन के समय दोनों समुदायों को भाईचारे और मोहब्बत से रोकने का प्रयास किया । 1952 में उन्हें रामपुर लोकसभा सीट से चुना गया, और 1957 में रामपुर और गुड़गांव दोनों सीटों से विजयी हुए । 1992 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया । उनकी याद में हर साल 11 नवंबर को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस मनाया जाता है । सुहैल अंजुम द्वारा प्रस्तुत यह कलमी खाका मौलाना आजाद के व्यक्तित्व और योगदान को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है।
नोट: लेखक सुहैल अंजुम एक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। उपर्युक्त विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। ये आवश्यक नहीं कि ग्लोबलटुडे के विचारों को प्रतिबिंबित करें। इस लेख से संबंधित सभी दावों या आपत्तियों के लिए केवल लेखक ही जिम्मेदार है।
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