बरेली: 8 सालों से रामलीला में श्रीराम बन रहे मुस्लिम कलाकार दानिश खान, सांप्रदायिक सौहार्द की अनोखी मिसाल

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जब कला धर्म से बड़ी हो जाती है

दोस्तों, आज की यह कहानी उन लोगों के लिए एक करारा जवाब है जो धर्म के नाम पर समाज को बांटने की कोशिश करते हैं। यह कहानी बताती है कि हमारी संस्कृति और कला हमेशा से धर्म से ऊपर रही है और रहेगी।

जब देश में आए दिन धार्मिक और सामाजिक टकराव की खबरें सुर्खियां बटोर रही हैं, ठीक उसी समय उत्तर प्रदेश के बरेली से एक ऐसी तस्वीर भी सामने आई है जो साबित करती है कि असली भारत की पहचान प्रेम, सौहार्द और एकता में है, नफरत में नहीं।

कला के मंच पर नहीं दिखता धर्म

बरेली के मुस्लिम कलाकार दानिश खान पिछले आठ सालों से लगातार रामलीला में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का किरदार निभा रहे हैं। यह सिर्फ एक रोल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता का एक जीवंत प्रतीक है।

हालांकि इस बार बरेली में हालात कुछ अलग थे। शहर के तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए कुछ लोगों ने दानिश को कहा कि वे राम का रोल न करें। लेकिन दानिश ने जो जवाब दिया, वह हर भारतीय के लिए प्रेरणा है – “मैं पिछले आठ साल से राम का रोल कर रहा हूं, हालात चाहे जैसे हों, मेरा किरदार बदलने वाला नहीं।”

समर्पण की अनूठी मिसाल

दानिश बताते हैं कि जैसे ही रामलीला का समय आता है, वे अपनी बहुत-सी आदतें बदल देते हैं – खान-पान से लेकर बोलचाल तक – ताकि अपने किरदार के साथ पूरी तरह न्याय कर सकें। यह समर्पण दिखाता है कि कला और संस्कृति के प्रति सच्ची निष्ठा किसी धर्म की मोहताज नहीं होती।

सीता का रोल निभा रहीं दीक्षा तिवारी भी इस बात को खूबसूरती से बयान करती हैं – “मंच पर पहुंचकर हमारा मज़हब पीछे छूट जाता है, और हमारी कला ही हमारी पहचान बन जाती है।”

Ramlila 1

भारत की असली परंपरा यही है

दानिश का मानना है कि देश में जो नफरत फैलाई जा रही है, उसका जवाब कला और सौहार्द से ही दिया जाना चाहिए। बरेली का हालिया विवाद, उनके अनुसार, समाज को बांटने की एक “साज़िश” से ज्यादा कुछ नहीं।

दरअसल, भारत की असली ताकत यही रही है। सदियों से हिंदू-मुसलमान कलाकार मिलकर रामलीलाओं, झांकियों और सांस्कृतिक आयोजनों को सजाते रहे हैं। दानिश खान उसी गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक नई कड़ी हैं, जो हमारे देश की असली पहचान है।

समाज के लिए संदेश

आज भी देशभर में कई मुस्लिम कलाकार रामलीला के मंचों पर अलग-अलग पात्र निभाते हैं और सांस्कृतिक एकता को जीवित रखते हैं। यह परंपरा हमें सिखाती है कि:

  • धर्म निजी आस्था है, संस्कृति सबकी साझी धरोहर है
  • कला की कोई जाति-धर्म नहीं होती
  • प्रेम और सौहार्द से ही समाज मजबूत बनता है
  • हमारी विविधता ही हमारी ताकत है

लेकिन आज का बड़ा सवाल यही है – क्या मौजूदा हालात में दानिश जैसे कलाकारों को प्रोत्साहन मिलेगा? क्या समाज इन्हें अपनाएगा या फिर धीरे-धीरे सांस्कृतिक आयोजनों से इनकी पहचान मिटा दी जाएगी?

हमारी जिम्मेदारी

दानिश खान जैसे कलाकारों की हिम्मत और समर्पण को सलाम करना ही काफी नहीं है। हम सबकी यह ज़िम्मेदारी है कि ऐसी मिसालों को आगे बढ़ाएं, नफरत फैलाने वालों का विरोध करें, और अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब को बचाए रखें।

क्योंकि असली भारत वही है जहां दानिश खान राम बनते हैं, जहां कला धर्म से बड़ी होती है, और जहां प्रेम नफरत पर भारी पड़ता है।

यही है हमारा भारत, यही है हमारी पहचान।

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