नई दिल्ली | 16 फरवरी, 2026: भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज नई दिल्ली में अलचिकि लिपि के शताब्दी महोत्सव में भाग लिया। इस ऐतिहासिक अवसर पर उन्होंने संताल समुदाय की समृद्ध भाषाई विरासत और आधुनिक युग में इसके महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
अलचिकि: संताल समुदाय की सशक्त पहचान
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि अलचिकि लिपि केवल लिखने का माध्यम नहीं, बल्कि विश्वभर में फैले संताल समुदाय की एकता और पहचान का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि पहले संताली भाषा को रोमन, देवनागरी या ओड़िया जैसी अन्य लिपियों में लिखा जाता था, जिससे शब्दों का सही उच्चारण संभव नहीं था।
“वर्ष 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मु द्वारा अलचिकि लिपि का आविष्कार एक क्रांतिकारी कदम था, जिसने संताली भाषा को उसका वास्तविक स्वरूप और सम्मान दिलाया।”
डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरकारी प्रयासों का उल्लेख
राष्ट्रपति ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियों को साझा किया:
- राष्ट्रपति भवन की वेबसाइट: अब संविधान की 8वीं अनुसूची की सभी 22 भाषाओं में उपलब्ध है, जिसमें संताली भाषा को अलचिकि लिपि में स्थान दिया गया है।
- प्रशासनिक पहल: झारखंड के राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल को याद करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने सरकारी कार्यालयों और लोकभवन के नाम अलचिकि लिपि में लिखवाए थे।
- संविधान की प्रति: 25 दिसंबर 2025 को राष्ट्रपति भवन में संताली भाषा और अलचिकि लिपि में लिखित भारत के संविधान की प्रति का विमोचन किया गया।
मातृभाषा और शिक्षा पर जोर
श्रीमती मुर्मु ने युवाओं और बच्चों से अपील की कि वे हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भाषाएं जरूर सीखें, लेकिन अपनी मातृभाषा संताली को अलचिकि लिपि में सीखना उनकी पहचान के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने पंडित रघुनाथ मुर्मु (गुरु गमके) के वचनों को उद्धृत करते हुए कहा कि “लिपि की उपेक्षा करना स्वयं की उपेक्षा करना है।”
विकास और मान्यता की यात्रा
राष्ट्रपति ने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी को याद करते हुए कहा कि उनके आशीर्वाद से ही 22 दिसंबर 2003 को संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। उन्होंने साहित्य अकादमी पुरस्कारों और पिछले 11 वर्षों में 100 से अधिक जनजातीय विभूतियों को मिले पद्म पुरस्कारों का भी जिक्र किया।
भविष्य की राह: अनुवाद और विस्तार
संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने लेखकों और शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि:
- संताली साहित्य का अन्य भाषाओं में अनुवाद किया जाए ताकि दुनिया इस समृद्ध संस्कृति को जान सके।
- स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थानों की दीवारों पर अलचिकि लिपि का प्रयोग बढ़ाया जाए।
- शताब्दी वर्ष के बाद भी इस लिपि के प्रचार-प्रसार के अभियान को निरंतर जारी रखा जाए।
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