एक ज़माने में मृतप्राय हो चुकीं रामपुर जनपद की नदियाँ आज फिर से जीवनदायिनी बनकर बह रही हैं। रेवती, अरिल, नीली, नहाल और नईया जैसी नदियाँ अब न केवल बहती हैं, बल्कि रामपुर की जल-संस्कृति और पर्यावरणीय संतुलन की मिसाल बन गई हैं। इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे है रामपुर के जिलाधिकारी श्री जोगिन्दर सिंह की दूरदर्शिता और नेतृत्व क्षमता।
जिलाधिकारी और कप्तान श्री विद्यासागर मिश्रा की अगुवाई में प्रशासन ने केवल सरकारी योजनाओं को अमल में लाने का काम ही नहीं किया, बल्कि स्थानीय नागरिकों, स्वयंसेवी संस्थाओं और पंचायतों को साथ लेकर एक जनआंदोलन खड़ा कर दिया। वर्षाजल पर निर्भर इन नदियों के पुनर्जीवन के लिए रिचार्ज पिट्स, वृक्षारोपण, तालाब निर्माण, नालों में फ़िल्टर चैंबर की स्थापना जैसे ठोस उपाय किए गए।
रेवती नदी: उत्तर प्रदेश के रामपुर जनपद में स्थित रेवती एक बरसाती नदी है, जिसकी कुल लम्बाई लगभग बारह किलोमीटर है। विकासखण्ड चमरौआ के ग्राम पंजाबनगर के पास अहमदनगर से प्रारम्भ होकर नारायणनपुर, बकैनिया, बहपुरा, चिकना आदि गाँवों तक विस्तृत यह नदी पिछले कुछ वर्षों में विलुप्तप्राय हो चुकी थी। इसका मुख्य स्रोत वर्षान-जल होने के कारण यह वर्ष के अधिकांश महीनों में जलहीन (सूखी) रहती थी, जिसके कारण स्थानीय कृषकों द्वारा इसके कुछ भाग पर अतिक्रमण कर उस पर कृषि कार्य किया जा रहा था।

शासन-प्रशासन तथा स्थानीय नागरिकों के संयुक्त प्रयास से अब इस मृतप्राय नदी को पुनर्जीवित किया जा चुका है। वर्षा ऋतु में गाँवों और खेतों में एकत्र अतिरिक्त जल को उचित दिशा में प्रवाहित कर बाढ़ के प्रभाव को कम करने में इस नदी का योगदान महत्वपूर्ण है। नदी बेसिन के दोनों तटबन्धों पर वृक्षारोपण के माध्यम से भूमि के अवांछित कटाव को रोकने तथा पर्यावरण संरक्षण सहित जल-संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। नदी बेसिन में जगह-जगह ‘रिचार्ज पिट’ तैयार कर स्थानीय पशु-पक्षियों के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। इसके साथ ही गाँव के नालों में फिल्टर चैम्बर लगाकर नदी में कचरा रहित पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की गई है।

अरिल नदी, जो सम्भल से निकलकर रामपुर होते हुए बदायूँ जाती है, पहले भूगर्भ जल के प्राकृतिक स्रोत से भरी रहती थी। जलस्तर गिरने के कारण यह नदी सूख गई थी। अब इस नदी में भी पुनर्जीवन के प्रयास जारी हैं जिससे पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।
नीली नदी, जो ग्राम बिसरी से शुरू होकर कोसी की सहायक नदी में मिलती है, आज फिर से फरवरी-मार्च तक जलयुक्त रहती है। इसके किनारे पाँच और दस एकड़ के विशाल तालाबों का निर्माण भी किया गया है जो भूजल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत बन गए हैं।
नईया नदी, जो उत्तराखंड से होकर स्वार तहसील में प्रवेश करती है, स्टोन क्रशर की गाद से लगभग समाप्त हो चुकी थी। अब इसके बेसिन की सफाई और जल संचयन के प्रयासों से उम्मीद है कि यह नदी भी फिर से बहने लगेगी।
नहाल नदी रामपुर जनपद की सबसे लम्बी बरसाती नदियों में से एक है।
नहाल नदी और अन्य छोटी जलधाराओं को भी संरक्षित कर प्रशासन ने जल प्रबंधन की एक सशक्त नींव रखी है। मिलक और चमरौआ तहसील की सीमा पर स्थित भैंसोड़ी के निकट गंगापुर कदीम से निकलकर श्यामपुर, धनेली पूर्वी, धनेली उत्तरी, रूपपुर, पीपलसाना, ज्योहरा, जालिफनगला, नवदिया नगला उदई, खाता चिन्तामन, पटना, वकनौरी, लखनाखेड़ा, धर्मपुरा, बबूरा, बराखास, क्योरार, कोठरा, मिलक मो० बख़्श, तिराह, निपनियां, निस्वी, सिंधौली, चकिया हयातनगर, अकौन्दा, आगापुर, लखीमपुर विश्नू तक विस्तृत इस नदी की कुल लम्बाई लगभग पचास किलोमीटर है। सिंधोली में यह कोसी नदी की सहायक पीलाखार नदी में मिल जाती है।

जिलाधिकारी जोगिन्दर सिंह और कप्तान श्री विद्यासागर मिश्रा की इस पहल से यह स्पष्ट हो गया है कि यदि नेतृत्व में संकल्प हो और जनता में सहभागिता की भावना हो, तो पर्यावरणीय संकट भी अवसर में बदला जा सकता है।
रामपुर अब उत्तर प्रदेश के उन ज़िलों में गिना जा रहा है जहाँ नदियों का पुनर्जीवन केवल एक योजना नहीं, एक सामाजिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान बन चुका है।
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