सैयद शाह मोहम्मद निज़ामी के इंतक़ाल से सूफी परंपरा को अपूरणीय क्षति: इंद्रेश कुमार

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नई दिल्ली | 9 फरवरी, 2026: हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह (दिल्ली) के सज्जादानशीन सैयद शाह मोहम्मद निज़ामी के इंतकाल से पूरे देश में शोक की लहर है। उनके निधन को भारत की साझा संस्कृति, सूफी परंपरा और गंगा-जमुनी तहज़ीब के एक युग का अंत माना जा रहा है।

इंद्रेश कुमार: “राष्ट्र ने खोया इंसानियत का मार्गदर्शक”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) के मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार ने गहरा दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि निज़ामी साहब ‘सुल्ह-ए-कुल’ (सबके साथ शांति और प्रेम) की जीती-जागती मिसाल थे।

इंद्रेश कुमार ने अपने संदेश में कहा:

“उनका जाना राष्ट्र की साझा विरासत के एक मज़बूत स्तंभ का गिर जाना है। उन्होंने जीवनभर मज़हब, जाति और भाषा की सीमाओं से ऊपर उठकर इंसानियत की सेवा की। उनकी खानकाह हमेशा से सांप्रदायिक सद्भाव का केंद्र रही, जहाँ हर धर्म के व्यक्ति का सम्मान होता था।”

राष्ट्र-एकता के सच्चे रहनुमा थे निज़ामी साहब

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय संयोजक शाहिद सईद ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि निज़ामी साहब ने कभी मज़हब के नाम पर दीवारें नहीं खड़ी कीं, बल्कि मोहब्बत के पुल बनाए। उन्होंने ज़ोर दिया कि मुल्क तभी मज़बूत होगा जब समाज में आपसी भरोसा कायम रहेगा।

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प्रमुख हस्तियों ने दी श्रद्धांजलि

निज़ामी साहब के व्यक्तित्व और समाज सेवा को याद करते हुए कई अन्य दिग्गजों ने भी अपनी संवेदनाएं व्यक्त कीं:

  • डॉ. शालिनी अली (राजनीतिक विश्लेषक): “उनका जाना एक युग का अंत है। आज के तनावपूर्ण माहौल में उनके ‘मोहब्बत और सब्र’ के पैग़ाम की ज़रूरत सबसे ज़्यादा है।”
  • डॉ. शाहिद अख्तर (कार्यकारी अध्यक्ष, NCMEI): “निज़ामी साहब तसव्वुफ़ (सूफीवाद) की जीवंत मिसाल थे। शिक्षा और संवाद पर उनका ज़ोर उन्हें एक महान आध्यात्मिक गुरु बनाता है।”

दरगाह निज़ामुद्दीन औलिया में उमड़ा जनसैलाब

हज़रत निज़ामी साहब के इंतकाल की खबर मिलते ही दरगाह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया में दुआओं और फातिहा पढ़ने वालों का तांता लग गया है। देश के विभिन्न हिस्सों से लोग उन्हें आखिरी सलाम पेश करने पहुँच रहे हैं।

हज़रत सैयद शाह मोहम्मद निज़ामी का जीवन ‘इंसानियत ही धर्म है’ के सिद्धांत पर आधारित था। भले ही वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ‘सुल्ह-ए-कुल’ की शिक्षा आने वाली पीढ़ियों को सद्भाव का मार्ग दिखाती रहेगी।

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