नई दिल्ली: देशभर में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) प्रक्रिया के बीच बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) की ड्यूटी के दौरान हुई मौतों पर SPECT फाउंडेशन की रिपोर्ट ने चुनावी सिस्टम, सरकार और चुनाव आयोग की जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के मुताबिक चुनावी काम के दबाव, मानसिक तनाव, आत्महत्या और अत्यधिक वर्कलोड जैसे कारक कम से कम 33 अधिकारियों की मौत से जुड़े बताए गए हैं, जबकि अब तक किसी ज़िम्मेदार संस्थान ने औपचारिक रूप से जवाबदेही स्वीकार नहीं की है।
SIR ड्यूटी के बीच 33 मौतें, ज़िम्मेदारी पर सवाल
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अलग-अलग राज्यों में SIR के दौरान तैनात लगभग 33 BLOs की मौत हुई है, जिनमें आत्महत्या, ब्रेन हेमरेज, अचानक हार्ट अटैक और काम के दौरान गिरकर मौत जैसे मामले शामिल बताए गए हैं। कई मीडिया रिपोर्टों में भी हाल के हफ्तों में यूपी, बंगाल, केरल और अन्य राज्यों में SIR ड्यूटी के दौरान कई BLOs के मौत और आत्महत्या के मामले सामने आने की बात कही गई है, जिसके बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर तीखे सवाल उठाए हैं।
SPECT फाउंडेशन–APCR की रिपोर्ट और निष्कर्ष
SPECT फाउंडेशन की ओर से जारी इस विस्तृत रिपोर्ट को एसोसिएशन फ़ॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) की कानूनी सहायता के साथ तैयार किया गया है, जिसमें मृतक BLOs के परिवारों, सहकर्मियों, स्थानीय प्रशासन और फील्ड सर्वे के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार कई जगह BLOs को बेहद कम समय में असामान्य रूप से ज़्यादा लक्ष्य पूरे करने का दबाव डाला गया, प्रशिक्षण व तकनीकी सपोर्ट के बिना काम कराए गए और डर दिखाया गया कि काम अधूरा रहा तो नौकरी पर भी असर पड़ सकता है।
ड्यूटी के हालात: लंबी शिफ्ट, तनाव और बिना सुविधा काम
रिपोर्ट में आरोप है कि कई राज्यों में BLOs से सामान्य कामकाजी घंटों से कहीं ज़्यादा देर तक ड्यूटी कराई गई और 14–18 घंटे तक काम करना आम बन गया, जबकि वे पहले से अपनी मूल नौकरी भी निभा रहे थे। कई मामलों में यात्रा सुविधा, सुरक्षा इंतज़ाम, समय पर भोजन, आराम और मेडिकल सहायता जैसी बुनियादी सुविधाएं भी पर्याप्त रूप से उपलब्ध न होने की बात सामने आई, जिसके चलते थकान, मानसिक अवसाद और तनावजनित मौतों के आरोप और तेज़ हुए हैं।
चुनाव आयोग और सरकार पर उठते सवाल
SPECT फाउंडेशन और APCR का कहना है कि ये मौतें किसी एक-दो “इंसीडेंट” नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता और मानवीय पहलुओं की अनदेखी का नतीजा हैं। दूसरी ओर, कुछ मौकों पर चुनाव आयोग की तरफ से BLOs की मौतों से जुड़े आरोपों को “अतिरंजित” या “प्रेरित” बताया गया है, जबकि अधिकारियों ने इन्हें “इंसुलेटेड केस” कहकर व्यापक स्तर पर सिस्टम पर दोष मढ़ने से इनकार किया है, जिस पर विपक्षी दल और अधिकार समूह और आक्रामक सवाल उठा रहे हैं।
न्यायिक जांच, मुआवज़ा और पॉलिसी सुधार की मांग
रिपोर्ट में दोनों संस्थाओं ने मांग की है कि सभी मौतों की न्यायिक या विशेष स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि काम के दबाव और प्रशासनिक लापरवाही की वास्तविक भूमिका सामने आ सके। साथ ही मृतक अधिकारियों के परिवारों के लिए उचित मुआवज़ा, सरकारी नौकरी या सामाजिक सुरक्षा, ड्यूटी के दौरान भोजन, यात्रा, मेडिकल और मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं अनिवार्य करने के साथ BLOs के लिए स्पष्ट और मानवीय वर्कलोड पॉलिसी बनाने की सिफारिश की गई है, ताकि भविष्य में ऐसी मौतों को रोका जा सके।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया बनाम मैदान में काम करने वालों की सुरक्षा
रिपोर्ट सवाल उठाती है कि जब चुनावी प्रक्रिया देश के लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती है, तो उसी प्रक्रिया को ज़मीन पर लागू करने वाले BLOs की जीवन सुरक्षा, सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य की जवाबदेही कौन लेगा। SPECT फाउंडेशन और APCR ने साफ कहा है कि वे BLOs के अधिकारों, सुरक्षा और न्याय के मुद्दे को अदालत से लेकर जन-प्लेटफॉर्म तक मजबूती से उठाते रहेंगे, ताकि इन 33 परिवारों की पीड़ा को महज़ आंकड़ों में समेटकर भुला न दिया जाए।
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