नई दिल्ली: राजधानी में बीती शाम अदब, सिनेमा, सहाफ़त (पत्रकारिता) और आज़ादी के ख़्वाब एक साथ साँस लेते नज़र आए। अवसर था “दास्तान-ए-ख़्वाजा अहमद अब्बास” की प्रस्तुति का, जिसने दर्शकों को एक ऐसे दौर की सैर कराई जहाँ कलम इंकलाब का हथियार थी और सिनेमा समाज को बदलने का एक खूबसूरत ज़रिया।
ख़्वाजा अहमद अब्बास मेमोरियल ट्रस्ट और दास्तानगोई कलेक्टिव के साझा प्रयास से आयोजित इस विशेष शाम की मेज़बानी अब्बास साहब की भतीजी सैयदा सैयदैन ने की, जो इस ट्रस्ट के ज़रिये उनकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का काम कर रही हैं।
कला और अभिनय का जीवंत संगम
दास्तानगोई कलेक्टिव की प्रोड्यूसर अनुषा रिज़वी और दास्तानगोई तहरीक के मुख्य स्तंभ महमूद फ़ारूक़ी की मौजूदगी में इस शाम को राणा प्रताप सेंगर और राजेश कुमार ने अपनी दिलकश अदायगी, गायन और बेमिसाल बयानिया अंदाज़ से जीवंत कर दिया। मंच पर अब्बास साहब की ज़िंदगी किसी फ़िल्मी रील की तरह खुलती चली गई। पानीपत के उस ख़ानदान से (जिसकी रगों में मौलाना हाली की अदबी विरासत थी) लेकर अलीगढ़ के तालीमी दौर और ‘अलीगढ़ ओपिनियन’ के प्रकाशन तक का सफ़र बेहद खूबसूरती से दिखाया गया।
भगत सिंह से प्रभावित युवा और ‘आम आदमी’ का सिनेमा
दास्तान में दिखाया गया कि कैसे भगत सिंह और जवाहरलाल नेहरू से प्रभावित एक बेचैन नौजवान आगे चलकर तरक़्क़ीपसंद तहरीक का एक अहम लेखक बना। दर्शकों को याद दिलाया गया कि ख़्वाजा अहमद अब्बास ही वह शख़्स थे जिन्होंने हिंदुस्तानी सिनेमा को नया संसार, धरती के लाल, आवारा, श्री 420, जागते रहो, मेरा नाम जोकर और बॉबी जैसी अमर फ़िल्में दीं। राज कपूर के “आम आदमी” की जो छवि पूरी दुनिया में मशहूर हुई, उसकी बुनियाद रखने वालों में अब्बास साहब सबसे आगे थे।

“उनके लिए सिनेमा महज़ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के दर्द और उम्मीदों को बयान करने का ज़रिया था। उनकी कहानियों में वही लोग नायक बने, जिनकी आवाज़ अक्सर ताक़तवर लोगों के शोर में दब जाती है।”
जब माहौल में छा गया बंगाल के अकाल का दर्द
प्रस्तुति के दौरान जब दास्तान ‘धरती के लाल’ फ़िल्म के पड़ाव पर पहुँची, तो बंगाल के अकाल का दर्द पूरे माहौल पर छा गया। फ़िल्म का मशहूर गीत गूंज उठा:
“केकरा केकरा नाम बताऊँ, इस जग में बड़ा लुटेवा हो, एक हुए बिन काम ना चलिए, सुनो किसान मज़दूरवा हो…”इन शब्दों ने भूख के दर्द के साथ-साथ मज़दूर और किसान की एकजुटता का पैग़ाम भी दिया।
इन पंक्तियों के गूंजते ही हॉल में कुछ पल की ख़ामोशी छा गई और ऐसा महसूस हुआ मानो अब्बास साहब अपने अटूट मानवीय यक़ीन के साथ फिर से मंच पर आ खड़े हुए हों। इस शाम ने साबित कर दिया कि ख़्वाजा अहमद अब्बास जैसे लोग वक़्त की गर्द में गुम नहीं होते, बल्कि अपने विचारों और ख़्वाबों के ज़रिये हमेशा ज़िंदा रहते हैं।
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