दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में कदम रखते ही इतिहास, आस्था और इंसानी फितरत का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिलता है, जो बरबस ही सोच में डाल देता है। यह सड़क का एक ही सिरा है, लेकिन यहाँ दो ऐसी दुनिया बसती हैं जो जमीन-आसमान जितना फर्क रखती हैं। एक तरफ महबूब-ए-इलाही हजरत निजामुद्दीन औलिया साहब की दरगाह है, जहाँ हर मजहब, हर जाति और हर वर्ग के इंसानों का तांता लगा रहता है; तो दूसरी तरफ मुगल बादशाह हुमायूं का भव्य मकबरा है, जो आज इतिहास के पन्नों या फिर आधुनिक दौर के एकांत प्रेमियों की शरणस्थली बनकर रह गया है।
यह फर्क सिर्फ दो इमारतों या दो जगहों का नहीं है, बल्कि यह एक ‘फकीर’ और एक ‘बादशाह’ के जीवन दर्शन, नियति और लोगों के दिलों में उनके रुतबे का सबसे बड़ा आईना है।
फकीर की चौखट और इंसानी सुकून
हजरत निजामुद्दीन औलिया ने अपनी पूरी जिंदगी अपने अल्लाह की रज़ा और इंसानों की खिदमत में गुजार दी। उन्होंने ताउम्र न तो महलों की ख्वाहिश रखी और न ही दुनियाई शोहरत के पीछे भागे। उन्होंने सिर्फ प्यार, इंसानियत और रूहानी सुकून का पैगाम दिया।
शायद यही वजह है कि सदियां बीत जाने के बाद भी उनकी मजार पर आज भी वही रौनक़, वही जीवंतता और वही अपनापन बरकरार है। वहाँ पहुँचने वाला हर शख्स अपने दुखों का बोझ हल्का महसूस करता है। कव्वालियों की गूंज, रूह को छू लेने वाला सन्नाटा और लंगर की महक इस बात की गवाही देती है कि जो इंसान खुदा का हो जाता है, खुदा दुनिया को उसके दर पर ला खड़ा करता है।
बादशाह का मकबरा और वक्त का फेर
इसके विपरीत, हुमायूं का मकबरा मुगलिया सल्तनत के वैभव और वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना है। एक तरफ जहाँ भव्य गुंबद और विशाल बाग-बगीचे हैं, वहीं दूसरी तरफ वहाँ वह रूहानी खिंचाव या लोगों का हुजूम नहीं दिखता जो किसी संत की दरगाह की शान होता है।
वक्त के पहिए ने ऐसा चक्कर चलाया कि जो बादशाह कभी दुनिया पर हुकूमत करता था, आज उसकी कब्र एक शांत पर्यटक स्थल या इतिहास प्रेमियों की सैरगाह बनकर रह गई है। यहाँ तक कि कई बार इस सूनेपन का फायदा वे लोग उठाते हैं जो शालीनता और सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रखकर एकांत तलाशते हैं। यह दृश्य देखकर एक टीस सी उठती है कि कैसे सत्ता और दौलत की नुमाइश करने वाले शासक की कब्र आज अपनी गरिमा के लिए तरस जाती है।
यह सबके लिए एक ‘इबरत’ (सबक) है
यह स्थल हमें यह सिखाता है कि दुनिया की बादशाहत और शोहरत चंद दिनों की मेहमान है। राजा-महराजाओं के महल और मकबरे वक्त के साथ महज़ ईंट-पत्थरों के ढेर और इतिहास के पन्ने बनकर रह जाते हैं, लेकिन जो लोग जनता के दिलों में अपनी जगह बनाते हैं, वे अमर हो जाते हैं।
यह हम सबके लिए एक खुला सबक (इबरत) है। जैसा कि रूहानी फलसफा भी कहता है—“तू मेरा हो जा, मैं दुनिया तेरी कर दूंगा।” जो शख्स अपनी जिंदगी को दुनिया की चकाचौंध के बजाय उस परवरदिगार की इबादत और इंसानियत की भलाई के लिए समर्पित कर देता है, दुनिया खुद-ब-खुद उसके कदमों में झुक जाती है।
निजामुद्दीन की ये दोनों इमारतें आज भी चुपचाप खड़ी दुनिया को यही पैगाम दे रही हैं—कि ताज और तख्त वक्त के साथ मिट जाते हैं, लेकिन फकीरी और मोहब्बत का पैगाम कभी पुराना नहीं होता।
- इबरत का मुक़ाम: औलिया की चौखट और बादशाह का मक़बरा

- National Institute of Mass Communication (NIMC): Premier Destination for BJMC & Media Education in India

- प्रो. (डॉ.) शाहिद अख्तर: इल्म, संवाद और सामाजिक सरोकारों की एक सशक्त आवाज़

- पत्रकारिता से राजनीति तक: यूसुफ़ अंसारी की नई पारी और एक नया इम्तिहान-खालिद मुस्तफ़ा (अलीग)

- JAUHAR UNIVERSITY NEEDS TO BE SAVED

