मौलाना सलमान हुसैनी नदवी का इंतकाल, इल्मी जगत शोकाकुल

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लखनऊ: भारतीय उपमहाद्वीप के प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान, चिंतक, लेखक और प्रखर वक्ता मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी का सोमवार को इंतकाल हो गया। उनके निधन की खबर से देश और विदेश के धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक हलकों में गहरा शोक फैल गया है। इस दुखद समाचार ने लाखों छात्रों, उलेमा, शिक्षाविदों और उनके चाहने वालों को गमगीन कर दिया है।

मौलाना सलमान हुसैनी नदवी लंबे समय तक लखनऊ स्थित दारुल उलूम नदवतुल उलेमा से जुड़े रहे। उन्होंने चार दशकों से अधिक समय तक हदीस की शिक्षा दी और हजारों विद्यार्थियों को ज्ञान प्रदान किया। उनके इंतकाल को इस्लामी दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।

अंतिम संस्कार और नमाज़-ए-जनाज़ा

प्राप्त जानकारी के अनुसार, मौलाना की नमाज़-ए-जनाज़ा सोमवार को असर की नमाज़ के बाद जामिया सैयद अहमद शहीद कटौली, मलिहाबाद में अदा की जाएगी। इसके बाद उन्हें वहीं सुपुर्दे खाक (दफन) किया जाएगा।

शुरुआती जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

  • जन्म: मौलाना सैयद सलमान हुसैनी नदवी का जन्म वर्ष 1954 में लखनऊ में हुआ था।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि: उनका संबंध उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के मंसूरपुर कस्बे के एक प्रतिष्ठित सादात परिवार से था। उनके पिता मौलाना सैयद मोहम्मद ताहिर हुसैनी एक सम्मानित धार्मिक व्यक्तित्व थे।
  • अली मियां से संबंध: मौलाना का परिवार लंबे समय से इल्म और दीन की खिदमत से जुड़ा रहा है। वह महान इस्लामी चिंतक और लेखक मौलाना अबुल हसन अली हसनी नदवी (जिन्हें दुनिया ‘अली मियां’ के नाम से जानती है) के भतीजे थे। यही इल्मी माहौल उनके व्यक्तित्व और विचारों के निर्माण में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।

शिक्षा और योग्यता

मौलाना ने अपनी शुरुआती शिक्षा घर और स्थानीय मकतब से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ में दाखिला लिया।

  • यहाँ उन्होंने हिफ्ज़-ए-कुरआन पूरा किया और आगे की धार्मिक शिक्षा हासिल की।
  • वर्ष 1974 में उन्होंने आलिमियत की डिग्री प्राप्त की। इसके दो वर्ष बाद उन्होंने फज़ीलत की उपाधि हासिल की।
  • उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने सऊदी अरब की प्रतिष्ठित इमाम मोहम्मद बिन सऊद इस्लामिक यूनिवर्सिटी में प्रवेश लिया। वहाँ से उन्होंने वर्ष 1980 में हदीस विषय में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की।
  • उनका शोध कार्य प्रसिद्ध विद्वान शेख अब्दुल फत्ताह अबू गुद्दा की देखरेख में पूरा हुआ, जिसे उनकी विद्वता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

अध्यापन और शिक्षण शैली

सऊदी अरब से लौटने के बाद मौलाना ने दारुल उलूम नदवतुल उलेमा में अध्यापन कार्य शुरू किया। उन्होंने लगभग 40 वर्षों तक हदीस की शिक्षा दी। उनके हजारों छात्र आज भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में धार्मिक और सामाजिक सेवाएं दे रहे हैं।

उनकी शिक्षण शैली शोध, तर्क और व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित थी। वह छात्रों को केवल किसी एक विचारधारा तक सीमित रहने के बजाय अध्ययन, अनुसंधान और सत्य की खोज के लिए प्रेरित करते थे। यही वजह रही कि उनके विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व की भूमिका निभा रहे हैं। मौलाना सलमान हुसैनी नदवी को अक्सर अली मियां के बौद्धिक और वैचारिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा जाता था।

सामाजिक और शैक्षिक योगदान

धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक और शैक्षिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया:

  • जमीयत शबाबे इस्लाम: वर्ष 1974 में नदवा से शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने युवाओं में धार्मिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों के विकास के लिए इस संगठन की स्थापना की।
  • जामिया सैयद अहमद शहीद: वर्ष 1985 में उन्होंने इस संस्थान की स्थापना की, जो आज महत्वपूर्ण धार्मिक शिक्षण केंद्रों में शामिल है।
  • अन्य संस्थान: उनकी देखरेख में अनेक मदरसों, पचास से अधिक मकातिब, लड़कियों के लिए ‘कुल्लिया हफ्सा लिल बनात’, कई हिरा स्कूलों तथा डॉक्टर अब्दुल अली यूनानी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल जैसे संस्थानों की स्थापना की गई।

प्रमुख कृतियाँ और लेखन कार्य

मौलाना केवल शिक्षक ही नहीं थे, बल्कि एक विपुल लेखक और शोधकर्ता भी थे। उन्होंने हदीस, कुरआन, शिक्षा, राजनीति, इस्लामी विचारधारा और समकालीन विषयों पर अरबी और उर्दू में कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं।

अरबी भाषा की प्रमुख पुस्तकें:

  • लम्हा अन इल्म अल जरह वत तादील
  • दुरूस मिन अल हदीस अल नबवी
  • मुफरदातुल कुरआन लिल बुखारी
  • अल मुकद्दिमा फी उसूल अल हदीस
  • बैन अहलुर राय वा अहलुल हदीस

उर्दू भाषा की प्रमुख पुस्तकें:

  • हमारा निसाबे तालीम क्या हो
  • तरतीब व तदवीन ए कुरआनी
  • आखिरी वही
  • उलेमा और सियासत
  • इंतेखाबे तफासीर
  • कुरआन की तरतीबे नुजूली
  • मुख्तसर तारीखे फिलिस्तीन
  • आलमी सियासी नजरियात और इस्लामी सियासत

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिनिधित्व

मौलाना ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य भी रहे। उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस्लामी शिक्षा, शरीयत, मुस्लिम समाज और समसामयिक मुद्दों पर अपने विचार रखे। उनकी तकरीरें और लेखन दुनिया भर में पढ़े और सुने जाते थे। धार्मिक मामलों पर उनकी राय को गंभीरता से लिया जाता था और वह विभिन्न विषयों पर खुलकर अपनी बात रखते थे।

एक युग का अंत

मौलाना सलमान हुसैनी नदवी के निधन से धार्मिक और शैक्षिक जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। उनके जाने से एक ऐसे विद्वान का अध्याय समाप्त हुआ है जिसने अपना पूरा जीवन शिक्षा, शोध, समाज सुधार और दीन की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। हालांकि, उनकी पुस्तकों, शिक्षण परंपरा, संस्थानों और हजारों शिष्यों के माध्यम से उनकी बौद्धिक और शैक्षिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती रहेगी।

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