हिंदी फिल्म संगीत के सुनहरे दौर में मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, मुकेश , मन्ना डे जैसे दिग्गजों के बीच लरजती, काँपती , मख़मली आवाज़ की बदौलत तलत महमूद ने अपना एक ऐसा मुक़ाम बनाया जहाँ उनकी विलक्षण उपस्थिति, उनका दबदबा आज तक कायम है। तलत महमूद जैसी आवाज़ हिंदी सिनेमा के इतिहास में दूसरी कोई नहीं है।

मोहम्मद रफ़ी ने दिलीप कुमार के लिए कई बेहतरीन गाने गाये हैं लेकिन परदे पर दिलीप कुमार के कुछ किरदारों के दुख, पीडा, अकेलेपन की त्रासदी को तलत महमूद की आवाज़ ने जिस तरह अभिव्यक्त किया है, वह बेजोड़ है। दा़ग़ फिल्म का ऐ मेरे दिल कहीं और चल, आरज़ू का ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो, फुटपाथ का शामे ग़म की क़सम इसकी चंद मिसालें हैं।दिलीप कुमार ही नहीं, देव आनंद पर फ़िल्माया गया टैक्सी ड्राइवर फिल्म का गाना- जाएँ तो जाएँ कहाँ, समझेगा कौन यहाँ दर्द भरे दिल की ज़ुबां – तलत महमूद की अद्भुत गायकी की एक और बानगी है।
सुनील दत्त पर फ़िल्माया गया सुजाता फिल्म का रोमांटिक गाना कौन संगीत प्रेमी भूल सकता है- जलते हैं जिसके लिए तेरी आँखों के दिये। संगदिल में दिलीप कुमार पर तलत की आवाज़ मे फ़िल्माया गया गाना- ये हवा ये रात ये चाँदनी तेरी इक अदा पे निसार हैं- प्रेम का अद्भुत सम्मोहन रचता है।
तलत महमूद ने सभी बड़े कलाकारों के लिए गाया , नये अभिनेताओं के लिए भी और कम चर्चित अभिनेताओं के लिए भी। कई गाने तो ऐसे हैं जिन्हें अभिनेताओं की वजह से नही बल्कि सिर्फ तलत महमूद की आवाज़ की वजह से आज तक लोकप्रियता हासिल है।
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अभिनय के फेर में न फँसे होते तो शायद गायकी का सफ़र कुछ और लंबा चलता। आवाज़ में विविधता की कमी भी एक वजह रही। बहरहाल जो गाया है, वह कमाल है।

तलत महमूद के गाने संख्या में भले ही अपने समकालीनों से कम हों लेकिन वे हमारे फिल्म संगीत के जगमगाते नगीने हैं, हिंदी सिनेमा के इतिहास की बेशक़ीमती धरोहर। आज तलत महमूद की सालगिरह है। 24 फ़रवरी 1924 को लखनऊ में उनका जन्म हुआ था। यह उनका जन्म शताब्दी वर्ष है।
नोट:- यह लेख वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की फेसबुक पोस्ट से उनकी सहमति से लिया गया है।
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