ग्लोबलटुडे एक्सक्लूसिव -बियर ग्रिल्स के शो को देख उसने पर्वतारोही बनने का सपना देखा और फिर हुआ ये

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ग्लोबलटुडे, दिल्ली 16 अगस्त
तरन्नुम अतहर की रिपोर्ट


उसका नाम है सागर लेकिन उसका सपना था आसमान की ऊंचाइयों को छूने का। दुनिया के मशहूर पर्वतों की चोटियों को फतह करने का। एक औसत परिवार में पले-बढ़े सागर के लिए ये सब करना आसान नहीं था। पर उन्होंने परिवार और दोस्तों की सहायता से वो सब मुक़ाम हासिल किया जो सचमुच आसमान छूने जैसा था। सागर ने यूरोप से लेकर अफ्रीका तक के सबसे ऊँची चोटियों को फतह किया और अभी हाल में उसने दुनिया की सबसे ऊँची छोटी एवरेस्ट को भी फतह कर लिया।

सागर,पर्वतारोही
सागर,पर्वतारोही

उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ियाबाद के रहने वाले सागर कसाना बचपन से ही डिस्कवरी चैनल देखना बहुत पसंद करते थे। वैसे तो आम हिंदुस्तानी बच्चों की तरह उन्हें क्रिकेट से बहुत प्यार है, पर बियर ग्रिल्स के शो के आगे वो अपना प्रिय क्रिकेट मैच भी छोड़ देता थे। ग्लोबलटुडे से बात करते हुए सागर बताते हैं कि जब उन्हें लगा कि वो पर्वतारोही बन सकते हैं तो उन्होंने ये बात अपने पिता को बताई। जब घर वाले तैयार हो गए तो सागर माउंटेनियरिंग के कोर्स के लिए पहले मनाली और फिर पहलगाम गए।
कोर्स पूरा होने के बाद उनके लिए अगली चुनौती थी पहाड़ों पर चढ़ने के लिए होने वाले भारी-भरकम खर्च का इंतज़ाम करना। कुछ दोस्तों की सहायता और बाकी लोन लेकर पिता ने आख़िरकार बेटे के सपने को पूरा करने के लिए हरी झंडी दिखा दी। सागर के पिता जिन्होंने एवेरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान सागर ने अपने एक खास दोस्त को भी खो दिया, पर आखिरकार मई के आखिरी हफ्ते में वो एवेरेस्ट पर तिरंगा फहराने में कामयाब रहे।

अब तक दुनिया की कई सारी चोटियों को फतह कर चुके सागर बैचलर ऑफ़ फिजिकल एजुकेशन की पढ़ाई भी कर रहे हैं। पहाड़ों पर चढ़ने के साथ-साथ पर्यावरण से प्रेम करने वाले सागर को गाजियाबाद नगर निगम ने स्वच्छता का ब्रांड अम्बेस्डर भी बना रखा है।

सागर ने बताया कि सैकड़ों लोग माउंट एवरेस्ट फतह करने का सपना लेकर निकलते हैं लेकिन हाड मास कंपा देने वाली सर्दी पत्थर जैसे नुकीली और फिसलन भरी बर्फ पर चलने के दौरान अच्छे-अच्छे पर्वतारोही भी आगे नहीं बढ़ पाते। आधे पर्वत रोही तो बेस के नंबर एक से ही वापस आ जाते हैं। सागर बताते हैं कि मेरा भी मन एक दो बार कमजोर पड़ा लेकिन मेरे देश के तिरंगे ने मेरा हौसला तब नहीं होने दिया। मैं उसी जुनून के साथ आगे बढ़ता रहा जो मैं अपने घर से लेकर चला था, मेरे पिता के आशीर्वाद ने साथ दिया।
एक-एक कदम यादगार था वह भी जब मैंने चढ़ाई शुरू की और वह भी जब कैंप लगाकर उसमें सामान रखे हुए था। मेरे बेस कैंप में बर्फीला तूफान आया और सब कुछ तहस-नहस कर गया, इसमें मैं बच गया लेकिन सामान सब कुछ गवा दिया, फिर एक नए सिरे से शुरुआत की।
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माउंट एवरेस्ट पर पहुंच कर मैंने सबसे पहले अपने बैग में रखे तिरंगे को निकाला और उसे शान के साथ फिर आया है यह मेरी जिंदगी का सबसे अनमोल पल और एक सपने के सच होने जैसा था और साथ ही मैंने माउंट एवरेस्ट की चोटी पर स्वच्छता का भी संदेश दिया।

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