सुप्रीम कोर्ट ने आजम खान की पत्नी-बेटे की याचिका पर यूपी सरकार को भेजा नोटिस

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Azam Khan had decided to join Congress, a big revelation by senior journalist Aziz Burney.
कांग्रेस में जाने का मन बना चुके थे आज़म ख़ान, वरिष्ठ पत्रकार अज़ीज़ बर्नी का बड़ा खुलासा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की पत्नी तंज़ीन फातिमा और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान की ओर से दायर याचिकाओं पर उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।तंज़ीन फातिमा और अब्दुल्ला आजम खान ने अलग-अलग याचिकाएं दायर की हैं, जिसमें उन्होंने कथित फर्जी प्रमाण पत्र (बर्थ सर्टिफिकेट) मामले में उनकी दोषसिद्धि (conviction) को निलंबित करने की मांग की है।

मामला क्या है?

यह मामला दिसंबर 2018 में रजिस्टर्ड एफआईआर से शुरू हुआ, जिसमें बीजेपी नेता आकाश सक्सेना ने आरोप लगाया था कि आजम खान और उनकी पत्नी ने अपने बेटे अब्दुल्ला आजम के लिए दो अलग-अलग जन्म प्रमाण पत्र बनाए थे। पहला प्रमाण पत्र 2012 में रामपुर नगर निगम द्वारा जारी किया गया था, जिसमें जन्म स्थान रामपुर बताया गया था, जबकि दूसरा प्रमाण पत्र 2015 में लखनऊ नगर निगम द्वारा जारी हुआ, जिसमें जन्म स्थान लखनऊ बताया गया था। इसके बाद अपराधिक धाराओं में आरोप पत्र दाखिल किया गया।

कोर्ट की कार्रवाई

रामपुर की अदालत ने अक्टूबर 2023 में तंज़ीन फातिमा, आजम खान और अब्दुल्ला आजम खान को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी सजा को निलंबित किया लेकिन दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई, जिससे वे चुनाव लड़ने से अयोग्य हो गए। इस फैसले के खिलाफ तंज़ीन फातिमा और अब्दुल्ला आजम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ जिसमें मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई, जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया शामिल हैं, ने सुनवाई के बाद उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के वकील निजाम पाशा से पूछा कि दोषसिद्धि पर कैसे रोक लगाई जा सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि दोषसिद्धि पर रोक बहुत ही दुर्लभ मामलों में ही लगाई जाती है, आमतौर पर सजा को निलंबित किया जाता है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क

याचिकाओं में तंज़ीन फातिमा और अब्दुल्ला आजम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को गलत बताया, जिसमें दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगी। उनका तर्क है कि इस फैसले का उनके आगे के राजनीतिक जीवन पर गंभीर और स्थायी असर पड़ेगा। उन्होंने दावा किया कि फर्जी प्रमाण पत्र साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है और हाईकोर्ट ने भी माना है कि फर्जीवाड़े का कोई सामग्री प्रमाण नहीं है।

इस तरह से यह मामला उनके राजनीतिक कैरियर और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है और सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील याचिका पर उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब मंगवाकर अब अंतिम सुनवाई की तैयारी शुरू कर दी है।