नई दिल्ली (डॉ. एम अतहर उद्दीन मुन्ने भारती):जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के हालिया बयानों पर कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें ‘संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन’ करार दिया है। मौलाना मदनी ने शुक्रवार को जारी एक बयान में कहा कि मुख्यमंत्री के शब्द न केवल नफरत को बढ़ावा दे रहे हैं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की नींव पर सीधा प्रहार हैं।
‘सामूहिक दंड’ की राजनीति पर उठाए सवाल
असम के मुख्यमंत्री के वक्तव्य पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए मौलाना मदनी ने कहा कि किसी विशेष समुदाय को डराना, उनके मताधिकार छीनने की धमकी देना और आर्थिक बहिष्कार के लिए उकसाना ‘सामूहिक दंड’ की मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक लोकतांत्रिक और सभ्य समाज में इस तरह की फासीवादी सोच के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
प्रशासन के दुरुपयोग का गंभीर आरोप
मौलाना मदनी ने मुख्यमंत्री पर सत्ता के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा:
“यदि किसी राज्य का मुखिया स्वयं सरकारी तंत्र और प्रशासनिक मशीनरी को किसी समुदाय विशेष के उत्पीड़न का हथियार बनाने की बात स्वीकार करता है, तो यह राज्य शक्ति का घोर दुरुपयोग है। यह सुनियोजित तरीके से एक वर्ग को निशाना बनाने और हिंसा को वैध ठहराने की खतरनाक कोशिश है।”
प्रमुख मांगें और संवैधानिक संस्थाओं को आगाह
जमीयत प्रमुख ने इस मामले को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखने की अपील की है। उन्होंने निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जोर दिया:
- कानूनी कार्रवाई: भड़काऊ और विभाजनकारी भाषणों के विरुद्ध तत्काल प्रभाव से एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए।
- संस्थागत सक्रियता: चुनाव आयोग और न्यायपालिका इस मामले में मूकदर्शक बने रहने के बजाय अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाएं।
- राष्ट्रीय मुद्दा: उन्होंने चेतावनी दी कि यह विषय किसी एक राज्य का नहीं है; यदि आज एक समुदाय के अधिकारों का हनन होता है, तो कल यह किसी के साथ भी हो सकता है।
लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न
मौलाना मदनी ने निष्कर्ष के तौर पर कहा कि नफरत और भय की राजनीति पूरे लोकतांत्रिक ढांचे की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। उन्होंने नागरिक समाज से भी लोकतंत्र की रक्षा के लिए आगे आने का आह्वान किया।
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