रायपुर: छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। आयोग की सख्ती के चलते एक प्रतिष्ठित स्कूल को न केवल बच्चे की पूरी फीस वापस करनी पड़ी, बल्कि शिक्षा विभाग को विशेष रूप से अपना बंद पोर्टल खोलकर बच्चे का नाम ‘निशुल्क शिक्षा’ की श्रेणी में दर्ज करना पड़ा।

क्या है पूरा मामला?
एक जरूरतमंद परिवार ने अपने बच्चे के लिए राज्य के एक नामी स्कूल में RTE के तहत आरक्षित सीट पर आवेदन किया था। अप्रैल में हुई पहली लॉटरी में बच्चे का चयन भी हो गया, लेकिन स्कूल प्रबंधन और नोडल अधिकारी की लापरवाही के कारण उसे प्रवेश नहीं मिल सका।
- स्कूल का तर्क: स्कूल ने दावा किया कि उन्होंने संपर्क करने की कोशिश की पर कोई जवाब नहीं मिला।
- नोडल अधिकारी का पक्ष: अधिकारी ने दलील दी कि पालक ने फोन नहीं उठाया।
- पालक की मजबूरी: हार मानकर पालक ने उसी स्कूल में 16,000 रुपये फीस भरकर बच्चे का सशुल्क (Paid) एडमिशन करा दिया।
आयोग की कार्यवाही और 10 महीने बाद न्याय
जब यह मामला छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पास पहुँचा, तो अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा ने इस पर त्वरित संज्ञान लिया। आयोग ने सुनवाई के दौरान पाया कि बच्चा नियमानुसार निशुल्क शिक्षा का हकदार है।
आयोग के कड़े आदेश के बाद:
- फीस वापसी: 23 फरवरी 2026 को आयोग की अध्यक्ष की मौजूदगी में स्कूल प्रबंधन ने 16,000 रुपये का अकाउंट पेयी चेक पालक को वापस किया।
- RTE पोर्टल पुनः खुला: शिक्षा विभाग को विशेष निर्देश देकर पोर्टल खुलवाया गया ताकि बच्चे का नाम सशुल्क श्रेणी से हटाकर ‘निशुल्क सीट’ पर दर्ज किया जा सके। इससे बच्चे को आगे की पूरी शिक्षा मुफ्त मिल सकेगी।
“बच्चों के हक से खिलवाड़ किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। आयोग यह सुनिश्चित करेगा कि हर पात्र बच्चे को उसका शिक्षा का अधिकार मिले।” — डॉ. वर्णिका शर्मा, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह मामला उन हजारों अभिभावकों के लिए एक मिसाल है जो तकनीकी खामियों या स्कूल की मनमानी के कारण अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि प्रक्रिया में कोई त्रुटि होती है, तो उसे सुधारना प्रशासन की जिम्मेदारी है, न कि बच्चों के भविष्य की कीमत पर उसे नजरअंदाज करना।
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