इतिहास का नकारात्मक आख्यान देश की बहुलतावादी परंपरा के लिए खतरा: सोहेल हाशमी

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नई दिल्ली, 17 दिसंबर 2025: मशहूर इतिहासवाचक, फिल्ममेकर और सांस्कृतिक संरक्षणकर्ता सोहेल हाशमी ने कहा कि भारत के इतिहास का नकारात्मक और पक्षपातपूर्ण आख्यान देश की बहुलतावादी सभ्यता के लिए गंभीर खतरा है। वे इंडियन हिस्ट्री फोरम (IHF) द्वारा आयोजित एक वेबिनार में बोल रहे थे।

कार्यक्रम में “हमारे पहनावे, भोजन और वास्तुकला की कहानी” विषय पर चर्चा करते हुए हाशमी ने कहा कि भारत की रोज़मर्रा की आदतें—जैसे पहनावा, खान-पान और वास्तु-कला—कठोर पहचान के विचारों से नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक मेल-जोल और पारस्परिकता से विकसित हुई हैं।

हाशमी ने बताया कि भारत उन शुरुआती इलाकों में से था, जहाँ कपास की खेती होती थी और धोती, साड़ी और लुंगी जैसे बिना सिले कपड़े प्रचलित थे। उन्होंने कहा कि सिले हुए परिधानों की परंपरा यूरोपीय संपर्क और कैंची के आगमन के बाद शुरू हुई। कुर्ता, पजामा, कमीज और ब्लाउज जैसे परिधानों की जड़ें विदेशी हैं, लेकिन वे अब भारतीय पहचान का हिस्सा बन चुके हैं।

भोजन पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय खान-पान वैश्विक लेन-देन का परिणाम है। कई सब्ज़ियां और फल जैसे आलू और मिर्च व्यापारिक रास्तों से भारत आए। उन्होंने पुर्तगालियों द्वारा शुरू की गई ग्राफ्टिंग तकनीक और मुगल काल में उसके विकास का भी उल्लेख किया। साथ ही भारत से गन्ने की खेती के प्रसार को उन्होंने वैश्विक श्रम और व्यापारिक इतिहास से जोड़ा।

वास्तु-कला पर चर्चा करते हुए हाशमी ने “हिंदू” या “इस्लामी स्थापत्य” जैसी औपनिवेशिक श्रेणियों की आलोचना की। उनके मुताबिक, ऐसी वर्गीकरण पद्धतियाँ पर्यावरण, जलवायु और स्थानीय सामग्री जैसे असल कारकों की अनदेखी करती हैं। उन्होंने कहा कि गुंबद और मेहराब जैसे स्थापत्य तत्व धर्मनिरपेक्ष विकास की उपज हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में अपने-अपने रूप में विकसित हुए।

हाशमी ने कहा कि पलायन, यात्रा और संपर्क इंसानी सभ्यता के मूल तत्व हैं, इसलिए “भारतीय” और “विदेशी” का कठोर विभाजन ऐतिहासिक दृष्टि से भ्रमकारी है।

इस वेबिनार का संचालन IHF की रिसर्च असिस्टेंट और कोऑर्डिनेटर हुमैरा अफ़रीन ने किया। उन्होंने कार्यक्रम के अंत में सोहेल हाशमी का धन्यवाद दिया और भारत के अतीत के प्रति समावेशी व ज्ञानपरक दृष्टिकोण के लिए फोरम की प्रतिबद्धता दोहराई।

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