नई दिल्ली: न्याय मिलने में देरी भले ही हुई, लेकिन अंततः सच्चाई की जीत हुई। दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए जमशेद ज़हूर पाल और परवेज़ राशिद लोन को आतंकवाद के गंभीर आरोपों से पूरी तरह मुक्त कर दिया है। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) की कानूनी लड़ाई के परिणामस्वरूप, आठ साल तक जेल की सलाखों के पीछे रहने के बाद ये दोनों युवक अब सम्मान के साथ समाज में लौट सकेंगे।
लाल किले के पास से हुई थी गिरफ्तारी, लगे थे ‘आतंक’ के आरोप
यह मामला सितंबर 2018 का है, जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एफआईआर नंबर 106/2018 के तहत दोनों युवकों को ऐतिहासिक लाल किले के पास से गिरफ्तार किया था। उन पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और आर्म्स एक्ट जैसी संगीन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। पुलिस का दावा था कि ये युवक किसी बड़ी आतंकी साजिश का हिस्सा थे, लेकिन अदालत में ये दावे ताश के पत्तों की तरह ढह गए।
8 साल का लंबा इंतजार और कानूनी पेचीदगियां
इन आठ वर्षों के दौरान आरोपियों को न सिर्फ जेल की यातनाएं सहनी पड़ीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया की सुस्ती का भी सामना करना पड़ा।
- विलंबित आरोप: गिरफ्तारी के लगभग चार साल बाद अप्रैल 2022 में जाकर मामले में आरोप (चार्ज) तय हुए।
- जमानत से इनकार: 2024 तक दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत याचिकाएं खारिज होती रहीं, जिसके कारण उन्हें बिना दोष सिद्ध हुए अपनी जवानी के आठ कीमती साल जेल में गुजारने पड़े।
अदालत का फैसला: सबूतों के अभाव में केस खारिज
पटियाला हाउस कोर्ट ने साक्ष्यों का बारीकी से परीक्षण करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोई भी ठोस, विश्वसनीय और निर्णायक सबूत पेश नहीं कर पाया। अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
“लेबल हट गया, पर जिंदगी के 8 साल कौन लौटाएगा?”
APCR के राष्ट्रीय सचिव नदीम खान ने इस फैसले को बड़ी जीत बताते हुए इसकी मानवीय कीमत पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा:
“आज इन व्यक्तियों के माथे से आतंकवाद का कलंक तो मिट गया है, लेकिन इनके जीवन के 8 साल नष्ट हो चुके हैं। यह मामला उदाहरण है कि कैसे निराधार आरोप किसी का भविष्य तबाह कर देते हैं।”
वहीं, संगठन के महासचिव मलिक मुतासिम ने कहा कि जब समाज ने इन्हें दोषी मान लिया था, तब APCR इनकी बेगुनाही के लिए लड़ रहा था। उन्होंने UAPA जैसे कानूनों के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग की।
न्यायिक मिसाल बनेगा यह फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य के लिए एक नजीर साबित होगा। यह फैसला याद दिलाता है कि संवेदनशील मामलों में भी अदालतों की जिम्मेदारी साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय लेने की है, न कि सामाजिक या राजनीतिक दबाव में आने की।
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