प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में अपराधियों के पैर में गोली मारने की बढ़ती घटनाओं, जिसे ‘हाफ एनकाउंटर’ के रूप में जाना जाता है, पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि वर्दी का इस्तेमाल व्यक्तिगत प्रशंसा और समय से पूर्व पदोन्नति (Promotion) के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
⚖️ “प्रमोशन और प्रशंसा के लिए कानून का उल्लंघन मंजूर नहीं”
जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए टिप्पणी की कि पुलिस अधिकारी केवल अपनी पीठ थपथपाने और सोशल मीडिया पर ‘हीरो’ बनने के चक्कर में अनावश्यक रूप से गोलीबारी कर रहे हैं। कोर्ट ने साफ किया कि पुलिस का काम कानून व्यवस्था बनाए रखना है, न कि प्रमोशन के शॉर्टकट के रूप में एनकाउंटर का सहारा लेना।
📋 हाईकोर्ट द्वारा जारी महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश
अदालत ने इस मामले में 6-सूत्रीय गाइडलाइंस जारी की हैं, जिसका उद्देश्य एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना है। कोर्ट की मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:
- जवाबदेही तय: यदि किसी भी एनकाउंटर में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का उल्लंघन पाया गया, तो जिले के SP, SSP और पुलिस कमिश्नर सीधे तौर पर जिम्मेदार होंगे।
- अवमानना की कार्रवाई: नियमों की अनदेखी पर बड़े अधिकारियों के खिलाफ ‘कोर्ट की अवमानना’ (Contempt of Court) का मामला चलाया जाएगा।
- अनावश्यक बल प्रयोग पर रोक: आत्मरक्षा की आड़ में जानबूझकर अपंग बनाने की प्रवृत्ति को गलत ठहराया गया है।
🚨 पुलिसिंग की नैतिकता पर बड़ा सवाल
यह आदेश उत्तर प्रदेश पुलिस के उस ‘एनकाउंटर मॉडल’ पर एक बड़ा कानूनी अंकुश माना जा रहा है, जिसकी चर्चा देश भर में होती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि ‘रूल ऑफ लॉ’ (कानून का शासन) सर्वोपरि है और पुलिस को अपराधी के साथ भी कानूनी प्रक्रिया के तहत ही व्यवहार करना चाहिए।
“अधिकारी सिर्फ तारीफ और समय से पहले प्रमोशन के लिए गोलियां चला रहे हैं, जो संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ है।” – इलाहाबाद हाईकोर्ट
हालांकि, हाईकोर्ट ने ये सख्त टिप्पणी मिर्जापुर के राजू मामले में कि है। अब इसपर सियासत भी तेज़ हो गई है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा, ‘झूठे एनकाउंटर प्रशासन को भ्रष्ट करते हैं। कोर्ट के अलावा किसी और का सज़ा देना, ख़ुद में एक गुनाह है।
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