नई दिल्ली: देश के कई राज्यों में उर्दू भाषा के विकास और उत्थान के लिए बनी सरकारी अकादमियां खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। उर्दू डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (यूडीओ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सैयद अहमद खान ने प्रांतीय सरकारों की उदासीनता पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर उर्दू अकादमियां वर्षों से भंग पड़ी हैं।
आरटीआई से हुआ चौंकाने वाला खुलासा
डॉ. खान ने सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि राजस्थान उर्दू अकादमी की स्थिति सबसे दयनीय है, जहाँ वर्तमान में एक भी स्टाफ मौजूद नहीं है। इसी तरह दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में भी अकादमियां लंबे समय से बिना किसी प्रबंधन या कार्यकारी समिति के ‘अनाथ’ स्थिति में चल रही हैं।
ठप्प पड़ा विकास कार्य
प्रेस नोट के अनुसार, इन अकादमियों के भंग होने का सीधा असर उर्दू भाषा की प्रगति पर पड़ रहा है। डॉ. खान ने निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला:
- योजनाओं का अभाव: अकादमियों में नेतृत्व न होने के कारण उर्दू के विकास के लिए कोई नई योजना लागू नहीं हो पा रही है।
- कार्यक्रमों पर रोक: भाषा के उत्थान के लिए आयोजित होने वाले सांस्कृतिक और शैक्षणिक कार्यक्रम पूरी तरह ठप्प हैं।
- स्टाफ की कमी: अकादमियां न केवल प्रशासनिक उपेक्षा बल्कि कर्मचारियों की भारी कमी से भी जूझ रही हैं।
‘सौतेला व्यवहार बंद करे सरकारें’
यूडीओ के अध्यक्ष ने प्रांतीय सरकारों से मांग की है कि उर्दू अकादमियों का तत्काल पुनर्गठन किया जाए। उन्होंने सरकारों पर निशाना साधते हुए कहा कि उर्दू के साथ किया जा रहा ‘सौतेला और भेदभावपूर्ण’ व्यवहार बंद होना चाहिए। उन्होंने पुरजोर वकालत की कि अन्य भाषाओं की तरह उर्दू के विकास के लिए भी सरकारों को समान रूप से सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
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