संसदीय शिष्टता लोकतंत्र की पहली शर्त, निजी हमलों से सदन की गरिमा को खतरा’ – कुंवर दानिश अली

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नई दिल्ली: पूर्व सांसद कुंवर दानिश अली ने भारतीय संसद में गिरते संवाद के स्तर और व्यक्तिगत चरित्र हनन की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। एक विशेष लेख के माध्यम से उन्होंने जोर देकर कहा कि संसद केवल एक ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि देश की सामूहिक चेतना का दर्पण है, जहाँ शब्दों की मर्यादा ही राजनीति का चरित्र तय करती है।

निजी रंजिश का केंद्र बनती संसद

दानिश अली ने सत्ता पक्ष पर तीखा हमला करते हुए कहा कि वर्तमान में सदन के भीतर नीतियों पर गंभीर बहस के बजाय संगठित रूप से व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और चरित्र हनन का सहारा लिया जा रहा है। उनके अनुसार, यह सोची-समझी रणनीति बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए अपनाई जा रही है। उन्होंने हाल ही में राहुल गांधी के विरुद्ध की गई टिप्पणियों को इसी का हिस्सा बताया।

2023 की घटना और मौन स्वीकृति का प्रश्न

अपने स्वयं के कड़वे अनुभवों को साझा करते हुए पूर्व सांसद ने साल 2023 की उस घटना का जिक्र किया जब भरी लोकसभा में उनके विरुद्ध अभद्र और सांप्रदायिक अपशब्दों का प्रयोग किया गया था। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं पर सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की चुप्पी ‘अशिष्टता’ को एक मौन स्वीकृति प्रदान करती है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए शर्मिंदगी का कारण बनती है।

लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार

लेख में विपक्ष की अनुपस्थिति में जल्दबाजी में पारित किए जा रहे कानूनों और बड़ी संख्या में सांसदों के निलंबन पर भी सवाल उठाए गए हैं। अली ने चेतावनी दी कि यदि संसद केवल कार्यपालिका के फैसलों पर मुहर लगाने वाली मशीन बन जाएगी, तो लोकतंत्र की आत्मा नष्ट हो जाएगी। उन्होंने सांसदों के बीच आपसी सम्मान और गरिमा को बनाए रखने की अपील की, ताकि आम नागरिकों के बीच भी सकारात्मक संदेश जाए।

‘नया सामान्य’ बनने से रोकना अनिवार्य

कुंवर दानिश अली ने अंत में स्पष्ट किया कि संसदीय शिष्टता बनाए रखना मुख्य रूप से सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है। उन्होंने अपमान की संस्कृति को ‘नया सामान्य’ (New Normal) बनने से रोकने की अपील करते हुए इसे भारत के संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए एक अनिवार्य कदम बताया।

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