दास्तानगोई : परंपरा और आधुनिकता का संगम

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नई दिल्ली: भारतीय सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य निधि दास्तानगोई आज नई पहचान बना रही है। यह पारंपरिक उर्दू कहानी कहने की कला, जो कभी मुगल दरबारों की शोभा थी, अब देश के सांस्कृतिक मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।

Darain Shahidi mehmood farooqui

“दास्तानगोई हमारे इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का एक अनमोल हिस्सा है,” कहते हैं महमूद फ़ारूकी, जो इसके पुनरुत्थान में अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने इस कला को न केवल पुरानी परंपराओं से जोड़ा है बल्कि आधुनिक विषयों पर भी दास्तानें रची हैं।

दास्तानगोई के प्रदर्शनों में दारेन शाहिदी का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। “यह कला संवाद और हाव-भाव की ताकत है, जो सीधे दिल तक पहुंचती है,” वह बताते हैं।

युवा कलाकार साहिल आगा ने भी पारंपरिक दास्तानों को आधुनिक संदर्भों में प्रस्तुत कर इस कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया है। “दास्तानगोई को जीवित रखना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है,” उनका कहना है।

sahil agha

देश के विश्वविद्यालयों एवं सांस्कृतिक केंद्रों में दास्तानगोई की कार्यशालाएं और प्रस्तुतियां बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, दास्तानगोई का पुनरुत्थान भारतीय साहित्य और प्रदर्शन कला के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो हमारी सांस्कृतिक विविधता को समृद्ध करता है।

यह पुनरुत्थान महमूद फ़ारूकी, दारेन शाहिदी और साहिल आगा जैसे समर्पित कलाकारों की बदौलत संभव हुआ है, जिन्होंने इस कला को वर्तमान समय में प्रासंगिक बनाए रखा है। उनका प्रयास भारतीय सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखने का मूल्यवान योगदान है।

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