भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ (D.Y. Chandrachud) हाल ही में दिए गए एक बयान को लेकर विवादों के घेरे में हैं। पत्रकार श्रीनिवासन जैन को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि “बाबरी मस्जिद एक मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी, इसलिए 1949 में मस्जिद के भीतर मूर्तियाँ रखना गलत नहीं था।” यह टिप्पणी न केवल चौंकाने वाली है बल्कि सुप्रीम कोर्ट के उसी ऐतिहासिक फैसले के भी विपरीत है, जिसके सह-लेखक चंद्रचूड़ स्वयं थे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उलट बयान
साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर स्पष्ट कहा था कि यह साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं है कि मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर किया गया था। साथ ही कोर्ट ने 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस को “अवैध कृत्य” और कानून का उल्लंघन करार दिया था। लेकिन अब, पांच साल बाद, उसी फैसले पर हस्ताक्षर करने वाले न्यायाधीश का सार्वजनिक रूप में उस निष्कर्ष से पलटना कई सवाल खड़े कर रहा है।
आस्था बनाम तथ्य
यह बयान इस गहरे संदेह को जन्म देता है कि क्या अयोध्या मामले का फैसला तथ्यों और संवैधानिक सिद्धांतों के बजाय आस्था और राजनीतिक दबाव से प्रभावित था। चंद्रचूड़ का तर्क संघ परिवार के पुराने दावों की लगभग हूबहू पुनरावृत्ति है, जिससे यह धारणा और मजबूत होती है कि न्यायपालिका हिंदुत्व की राजनीतिक परियोजना के साथ कदमताल करती रही है।
विवादास्पद रुख और बयान
यह पहली बार नहीं है जब चंद्रचूड़ की वैचारिक झुकाव पर सवाल उठे हों।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गणेश पूजा के लिए निजी आमंत्रण देना।
- अयोध्या पर फैसला लिखने से पहले ईश्वर से “मार्गदर्शन मांगने” की स्वीकारोक्ति।
- ज्ञानवापी विवाद में पूजा स्थल अधिनियम (1991) की कमजोर व्याख्या कर बहुसंख्यकवाद को बल देना।
इन सभी कदमों को आलोचक न्यायिक निष्पक्षता पर आघात और आरएसएस-प्रेरित सोच का प्रतीक मानते हैं।
सेवानिवृत्ति पश्चात पद और संदेह
चंद्रचूड़ ने खुले तौर पर कहा कि वे सेवानिवृत्ति के बाद लाभकारी पद लेने के विरोधी नहीं हैं। ऐसे बयानों से यह आशंका गहराती है कि कहीं उनके कार्यकाल के दौरान दिए गए फैसले सत्ता के प्रति झुकाव और भविष्य की पद-लाभ अपेक्षाओं से प्रभावित तो नहीं थे।
व्यापक असर और न्यायपालिका पर प्रश्न
हाल का बयान सिर्फ व्यक्तिगत विवाद का मामला नहीं है। यह न्यायपालिका की निष्ठा और जनता के भरोसे को चुनौती देता है। जब एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश चोरी-छिपे मूर्तियाँ रखने जैसे अवैध कृत्य को सही ठहराते हैं या बहुसंख्यकवादी आख्यानों को आगे बढ़ाते हैं, तो कानून के शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गहरी चोट पहुंचती है।
बदलती विरासत
कभी प्रगतिशील छवि वाले चंद्रचूड़ की आज की टिप्पणियाँ उनकी न्यायिक विरासत का आकलन बदल सकती हैं। आलोचकों को यह बयान उस आशंका की पुष्टि जैसा लगता है कि भारतीय न्यायपालिका तटस्थता खोकर सत्ता और बहुसंख्यकवादी राजनीति के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है।
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