अश्रुपूरित श्रद्धांजलि: सीमांचल ने खोया अपना एक जमीनी और सादगीपसंद नेता

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सादगी, जनसरोकार और आम लोगों से आत्मीय जुड़ाव के लिए लंबे समय तक याद किए जाएंगे हाजी अब्दुल जलील मस्तान

हाजी अब्दुल जलील मस्तान साहब का निधन सीमांचल के सामाजिक और राजनीतिक जीवन के लिए एक बड़ी क्षति है। उनका जाना केवल एक राजनेता का जाना नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच सहजता से मौजूद रहने वाली एक परिचित आवाज का खामोश हो जाना है। लंबे सार्वजनिक जीवन में उन्होंने जनता और कार्यकर्ताओं के साथ जो आत्मीय संबंध बनाए, वही उनकी सबसे बड़ी पहचान रही।

मस्तान साहब की चर्चा जब भी होगी, उनकी राजनीतिक भूमिका के साथ उनकी सादगी का जिक्र जरूर होगा। उनके व्यक्तित्व में दिखावे के लिए कोई खास जगह नहीं थी। बड़े राजनीतिक पदों पर रहने के बावजूद उनका व्यवहार आम आदमी जैसा ही रहा।

मैंने खुद उन्हें बाजार में आम लोगों की तरह खरीदारी करते देखा है। उनके साथ न कोई विशेष तामझाम होता था और न ही ऐसा लगता था कि कोई बड़ा राजनेता बाजार में आया है। वे बिल्कुल सहज भाव से बाजार में घूमते, जरूरत का सामान खरीदते और लोगों के बीच उसी तरह नजर आते थे जैसे कोई सामान्य व्यक्ति। मेरे लिए उनकी सादगी की इससे बड़ी मिसाल शायद कोई और नहीं हो सकती। इतने लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद उन्होंने अपने पद और जनता के बीच कोई दीवार खड़ी नहीं होने दी।

Abdul Jaleel Mastan 1

शायद यही कारण था कि आम आदमी उनसे अपनी बात कहने में सहज महसूस करता था। कार्यकर्ताओं के लिए भी उनका रिश्ता केवल राजनीति तक सीमित नहीं था। सुख-दुःख में साथ खड़ा होना, लोगों की समस्याओं को सुनना और उनकी आवाज को आगे तक पहुंचाने का प्रयास करना उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा रहा।

सीमांचल जैसे इलाके में राजनीति का मतलब केवल चुनाव और सत्ता नहीं है। यहां सड़क, पुल-पुलिया, बाढ़, कटाव, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे सवाल सीधे लोगों के जीवन से जुड़े हैं। किसी गांव की सड़क खराब हो तो उसका असर बच्चों के स्कूल जाने से लेकर मरीज को अस्पताल पहुंचाने तक पड़ता है। पुल-पुलिया का अभाव हो तो बरसात में कई इलाकों का संपर्क प्रभावित हो जाता है। मस्तान साहब के राजनीतिक सरोकारों में ऐसे बुनियादी सवाल हमेशा महत्वपूर्ण रहे।

उनकी राजनीति में क्षेत्रीय विकास और सामाजिक सरोकार एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। वे जानते थे कि सीमांचल के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। गांवों तक सड़क पहुंचे, आवागमन बेहतर हो, बाढ़ और कटाव की समस्या पर गंभीरता से काम हो, युवाओं को शिक्षा और रोजगार के अवसर मिलें—इन सवालों पर लगातार आवाज उठाना जरूरी है।

सुरजापुरी समाज से उनका जुड़ाव भी उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। समाज के सम्मान, अधिकार और बेहतर अवसरों से जुड़े सवालों को लेकर उनकी अपनी भूमिका और सरोकार रहे। सुरजापुरी समाज के आरक्षण और अधिकार से जुड़े प्रश्न आज भी क्षेत्र की सामाजिक बहस का हिस्सा हैं। ऐसे सवालों को राजनीतिक और सामाजिक मंच पर जगह मिलना भी जरूरी है, क्योंकि किसी समाज का विकास केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि उसके सम्मान और अवसरों से भी तय होता है।

मस्तान साहब की एक खासियत यह रही कि वे राजनीति को केवल चुनावी मौसम की गतिविधि नहीं मानते थे। जनता से उनका रिश्ता चुनावी परिणामों से आगे था। यही किसी भी जमीनी नेता की असली पहचान होती है। चुनाव जीतना राजनीतिक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जनता के बीच लंबे समय तक अपनी जगह बनाए रखना उससे कहीं बड़ी बात है।

आज उनके जाने के बाद उनकी कमी सबसे ज्यादा उन्हीं लोगों को महसूस होगी, जो किसी समस्या के साथ उनके पास पहुंचते थे। बाजार में सहजता से खरीदारी करते हुए दिखने वाला वह चेहरा, कार्यकर्ताओं के बीच बैठकर उनकी बातें सुनने वाला वह व्यक्ति और क्षेत्र की समस्याओं को लेकर आवाज उठाने वाला वह नेता अब हमारे बीच नहीं है।

उनकी स्मृति को जीवित रखने का सबसे सार्थक तरीका यही होगा कि जनता के उन सवालों को आगे बढ़ाया जाए, जिनसे उनका सार्वजनिक जीवन जुड़ा रहा—सड़क, पुल-पुलिया, बाढ़-कटाव, शिक्षा, रोजगार, क्षेत्र का विकास और सामाजिक अधिकार।

सीमांचल ने एक अनुभवी जमीनी नेता खोया है। सुरजापुरी समाज ने अपना एक जाना-पहचाना चेहरा खोया है और हजारों लोगों ने उस व्यक्ति को खोया है, जिसे वे अपने बीच का मानते थे।

हाजी अब्दुल जलील मस्तान साहब की सबसे बड़ी पहचान शायद यही रहेगी कि बड़े राजनीतिक जीवन के बावजूद वे आम आदमी बने रहे।

इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन (हम अल्लाह के ही हैं और हमें उसी की तरफ लौटकर जाना है)

अल्लाह तआला हाजी अब्दुल जलील मस्तान साहब की मगफिरत फरमाए, उन्हें जन्नत-उल-फिरदौस में आला मकाम अता करे और उनके शोकाकुल परिवार, समर्थकों एवं चाहने वालों को यह असीम दुख सहन करने का सब्र-ए-जमील अता फरमाए।

— अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि

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