
सीताराम येचुरी का नाम पहली बार 1990 के दशक की शुरुआत में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय(JNU) में सुना, जब किसी ने एक सेमिनार का उल्लेख किया। एक मित्र ने यूं ही कहा, “सीता आ रहे हैं।” मैं उत्सुकतावश किसी और की उम्मीद कर रहा था, लेकिन जब वह पहुंचे, तो मुझे एहसास हुआ कि यह “सीता” नहीं, बल्कि सीताराम येचुरी थे। उस समय मुझे यह अंदाज़ा नहीं था कि वह मेरे मन पर इतना गहरा प्रभाव छोड़ेंगे, विशेषकर उस समय जब धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ संघर्ष अत्यंत ही महत्वपूर्ण हो गया था।
मेरा येचुरी से पहला सार्थक सामना बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुआ। सांप्रदायिकता की बढ़ती लहर और धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ उनके तीखे आलोचनात्मक विचारों में मुझे सुकून मिला। उनके नाम में सीता भी थीं और राम भी थे— लेकिन उनकी लड़ाई उनके खिलाफ थी जो राम के नाम का राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग कर रहे थे। उनमें, भारत को एक धर्मनिरपेक्ष, बहुलतावादी लोकतंत्र के रूप में देखने की अडिग प्रतिबद्धता दिखाई दी, जो हमेशा उनके दिल के करीब रहा।
ये भी पढ़ें :
- हाइट-वेट पूछकर मिला ‘धुरंधर: द रिवेंज’ में बड़े साहब का रोल, दानिश इकबाल के लिए किरदार निभाना आसान नहीं था

- JIH President Condemns US-Israel Aggression on Iran, Warns Against Wider Gulf War

- मनरेगा पर चोट ग्रामीण भारत पर हमला है: सनोवर आलम

बाद में, मुझे करन थापर के समसामयिक शो के दौरान येचुरी के साथ नियमित रूप से बातचीत करने का अवसर मिला, जो अक्सर जामिया मिल्लिया इस्लामिया(JMI) के मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर में शूट होते थे। उन शूटिंग के दौरान एक कैमरामैन के रूप में, मैंने उनके तेज बुद्धि और प्रभावशाली वक्तृत्व को करीब से देखा। वह हमेशा अच्छी तरह से तैयार तर्कों के साथ आते थे, सत्ता से सच बोलने से कभी नहीं कतराते और यथास्थिति को चुनौती देने में संकोच नहीं करते थे।
सादगी और विनम्रता
2002 में, आपातकाल की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर मेरी उनके साथ सबसे व्यक्तिगत बातचीत हुई। मैं इंडिया हैबिटेट सेंटर में ‘1975: ए ईयर ऑफ डेमोक्रेट्स एंड डिक्टेटर्स’ नामक अपनी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग कर रहा था और मुझे पता था कि येचुरी की आवाज़ पोस्ट-स्क्रीनिंग पैनल चर्चा में गहराई जोड़ देगी। मैंने उनसे संपर्क किया, और मेरी खुशकिस्मती से, उन्होंने भाग लेने के लिए सहमति दी। हालाँकि, अंतिम समय में अंतरराष्ट्रीय यात्रा के कारण, वह पैनल चर्चा में शामिल नहीं हो सके। फिर भी, उन्होंने हवाई अड्डे जाने से पहले पांच मिनट के लिए ही सही स्क्रीनिंग में भाग लेने का प्रयास किया। उनकी वह संक्षिप्त लेकिन महत्वपूर्ण उपस्थिति मेरे लिए बहुत मायने रखती थी। यह उनकी सादगी और विनम्रता का प्रमाण था, जो उनके जीवन की पहचान थी।

समाज की भलाई के लिए समर्पण
येचुरी का जीवन केवल राजनीति के लिए नहीं था, बल्कि मानवता के लिए भी था। वह हमेशा हाशिए पर पड़े और शोषित लोगों के लिए आवाज बने, गरीबों के हित में हमेशा खड़े रहे। उनका संघर्ष केवल भाषणों और बहसों तक सीमित नहीं था; यह उन लोगों की वास्तविकताओं में निहित था, जिनका वह प्रतिनिधित्व करते थे। उनकी विरासत उनके शब्दों और कार्यों तक ही सीमित नहीं है। अपनी मृत्यु में भी, उन्होंने मानवता पर एक अमिट छाप छोड़ी, उन्होंने अपना शरीर चिकित्सा अनुसंधान के लिए दान कर दिया, समाज की भलाई के लिए अपने समर्पण को अपने आखिरी पलों तक बनाए रखा।

एकता का प्रतीक

एक ऐसे विश्व में, जो दिन-ब-दिन धर्म, जाति और पंथ के आधार पर बंट रहा है, सीताराम येचुरी एकता का प्रतीक थे। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता की मशाल को आगे बढ़ाया, उन सिद्धांतों से कभी पीछे नहीं हटे, जो एक न्यायपूर्ण और समावेशी भारत की नींव रखते हैं। उनका जीवन इस बात का स्थायी स्मरण है कि सच्चे नेतृत्व का मतलब करुणा, सेवा और समानता और न्याय के सिद्धांतों के प्रति अडिग प्रतिबद्धता है।
जब हम उनके योगदान पर विचार करते हैं, तो येचुरी की यात्रा हमें प्रेरित करती है कि हम अपने राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता की धारा को बनाए रखें और उन ताकतों के खिलाफ खड़े हों, जो हमें विभाजित करने का प्रयास करती हैं। हम में से जिन्होंने भी उनके साथ चंद पल गुजारे हैं, वह पल उनके जीवन की प्रेरणा बनकर हमेशा उनके साथ रहेंगे, जैसा कि में उन पांच मिनटों को हमेशा अपनी यादों में संजोए रखूंगा जो उन्होंने मेरी डॉक्यूमेंट्री स्क्रीनिंग में बिताए थे।
(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह जरूरी नहीं कि ग्लोबलटुडे इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.)
- बंगाल चुनाव का पहला चरण: हिंसा और ईवीएम की खराबी के बीच रिकॉर्ड 92% मतदान

- ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से होगा ‘आतंकिस्तान’ का अंत: पहलगाम हमले की बरसी पर गरजे इंद्रेश कुमार

- Operation Sindoor to Continue Until ‘Terroristan’ is Eliminated: Indresh Kumar

- जामिया मिल्लिया इस्लामिया स्कूल का कक्षा 10वीं बोर्ड रिजल्ट घोषित, छात्राएं फिर आगे रहीं

- Jamia Millia Islamia Declares Class X Results: Girls Outshine Boys with 98.65% Pass Rate

- यूनानी तिब्बी कांग्रेस की बैठक: हकीम अजमल खान के विचारों को आगे बढ़ाने और जामिया में यूनानी कॉलेज की स्थापना पर ज़ोर

